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"बेदाग़ कंकड़ से दाग़ वाला हीरा अच्छा." "सब कुछ बेहतरीन करने की ज़िद, अच्छे काम की दुश्मन होती है." ऐसी कहावतें कई भाषाओं और संस्कृतियों में मिलती हैं और सबका मतलब एक ही है. अगर आप सबसे बेहतरीन नतीजे की ज़िद पकड़ लें, तो हो सकता है कि आपके नतीजे असल में और ख़राब हो जाएं या आप उस लक्ष्य तक पहुंच ही न पाएं, जिसके लिए आप निकले थे. नौकरी हो या घर, हम में से ज़्यादातर लोग यह समझते हैं कि "काफ़ी अच्छा" ही काफ़ी होता है.
पर निवेश के मामले में बात अलग हो जाती है. बहुत से निवेशकों को लगता है कि उनके (या किसी और के) चुने हर निवेश को अच्छा करना ही चाहिए, वरना चुनने के तरीक़े में ही कोई गड़बड़ है. कुछ साल पहले मैंने एक ख़ास तरह के एनालेसिस के बारे में लिखा था, जो म्यूचुअल फ़ंड के कुछ जानकारों ने अपना लिया था. वो इक्विटी फ़ंड्स के पुराने पोर्टफ़ोलियो खंगालते और ऐसे शेयर गिनाते जो फ़ंड ने ख़रीदे थे पर जिन्होंने अच्छा नहीं किया. फिर इसी को फ़ंड मैनेजमेंट की कमज़ोरी का सबूत बताया जाता. इस तरीक़े की दिक़्क़त यह है कि यह पोर्टफ़ोलियो के विचार को और डाइवर्सिफ़िकेशन की अहमियत को, पूरी तरह भुला देता है.
जब आप किसी निवेश पोर्टफ़ोलियो को परखते हैं, तो उसमें कुछ शेयर ऐसे होंगे ही, जिन्होंने अच्छा नहीं किया. देर-सबेर, ज़्यादातर अनुभवी और व्यावहारिक निवेशक इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि परफ़ेक्शन मुमकिन नहीं है. अगर आप परफ़ेक्शन के पीछे भागेंगे, तो आप कोई फ़ैसला ही नहीं ले पाएंगे. आपका पैसा या तो लंबे समय तक सेविंग्स अकाउंट में पड़ा रहेगा या बाज़ार के हर छोटे झटके पर एक निवेश से दूसरे में भटकता रहेगा.
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इसकी सबसे क़रीबी मिसाल मेरे अपने अनुभव से है. मेरी कंपनी ने क़रीब चार साल पहले वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र सर्विस शुरू की थी. इस दौरान हमने क़रीब 50 शेयरों की रेकमेंडेशन दी है, हर तरह की इंडस्ट्री, सेक्टर और पृष्ठभूमि वाली कंपनियों की. कहने की ज़रूरत नहीं कि मेरे अपने पोर्टफ़ोलियो में भी यही शेयर हैं. इस दौरान कुछ शेयरों ने ख़राब प्रदर्शन किया है. पर ज़्यादातर शेयरों ने अच्छा किया है और कुछ ने तो बहुत ही अच्छा. कुल मिलाकर, यह एक अच्छा पोर्टफ़ोलियो रहा है.
तो क्या मुझे उन शेयरों को लेकर परेशान रहना चाहिए, जिन्होंने ख़राब किया? बेशक, हम उनकी पूरी पड़ताल करते हैं कि क्या ग़लत हुआ. सिर्फ़ कंपनियों की ही नहीं, अपनी सोच और अपने तर्क की भी. पर हम इसकी चिंता नहीं करते. कभी-कभार होने वाली नाकामी का इलाज यह नहीं कि आप अपने निवेश में परफ़ेक्शन लाने की कोशिश करें, बल्कि यह पक्का करें कि आपका पोर्टफ़ोलियो काफ़ी बड़ा और काफ़ी डाइवर्सिफ़ाइड हो.
और एक बार आप यह समझ लें कि निवेश का पोर्टफ़ोलियो होता ही क्यों है और डाइवर्सिफ़िकेशन की क्या अहमियत है, तो साफ़ हो जाता है कि मायने आपके पूरे पोर्टफ़ोलियो के प्रदर्शन के हैं, किसी एक निवेश के नहीं, जो ख़राब निकल गया. एक निवेशक के तौर पर मैं नाकामियों की चिंता नहीं करता. ऐसा कोई पोर्टफ़ोलियो कभी नहीं रहा, जिसमें लंबे समय तक कुछ ख़राब शेयर न रहे हों. इक्विटी में निवेश ऐसे ही काम करता है.
इसका हल सीधा है: दुनिया का सबसे पुराना जोखिम घटाने का तरीक़ा, यानी डाइवर्सिफ़िकेशन. इसका सिद्धांत बहुत आसान है. सारे निवेश एक साथ अच्छा नहीं करते. आम तौर पर किसी भी वक़्त कुछ निवेश अच्छा करते हैं और कुछ उतना अच्छा नहीं या ख़राब भी. अगर आपने किसी ऐसी चीज़ में ज़रूरत से ज़्यादा पैसा लगा रखा है, जो किसी ख़ास दौर में ख़राब कर रही है, तो आपको मुश्किल होगी. डाइवर्सिफ़िकेशन का फ़ायदा यही है कि यह आपको कुछ गिने-चुने निवेशों के ख़राब प्रदर्शन से बचाता है. अगर कोई ख़ास कंपनी या सेक्टर मुश्किल में है, तो उसमें आपका सीमित पैसा होना आपको बचा लेता है. और डाइवर्सिफ़िकेशन सिर्फ़ सेक्टरों में नहीं, कंपनियों के साइज़ में भी होना चाहिए, क्योंकि कई बार सिर्फ़ छोटी या सिर्फ़ बड़ी कंपनियां ही अच्छा या ख़राब करती हैं.
बेशक, यह एक बार करके छोड़ देने वाला काम नहीं है, इसे लगातार बनाए रखना पड़ता है. इसीलिए निवेश चुनकर फिर ख़राब निवेशों को लेकर परेशान रहने से कहीं बेहतर है, इस पर क़रीब से नज़र रखना कि आपका पैसा असल में कितना डाइवर्सिफ़ाइड है.
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