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क्या कम मार्जिन होना उदासी का सबब है?

ऑपरेट करने का कम मार्जिन अपने आप में किसी कंपनी को नज़रअंदाज़ करने का कारण नहीं होना चाहिए। यहां उन कंपनियों की बात जो कम मार्जिन, मगर भरोसे की हैं।

ऑपरेट करने का कम मार्जिन अपने आप में किसी कंपनी को नज़रअंदाज़ करने का कारण नहीं होना चाहिए। यहां उन कंपनियों की बात जो कम मार्जिन, मगर भरोसे की हैं।

ऐसा मान लिया जाता है कि जो बिज़नस कम ऑपरेटिंग (इन्टर्स्ट टैक्स ईबीआईटी से पहले जोड़ा गया मुनाफ़ा) मार्जिन के हैं, वो खराब हैं। मगर क्या ये बात हमेशा सही होती है? इस पैमाने से तो रीटेल बाहर ही हो जाएगा (एवेन्यू, सुपरमार्ट्स्, ट्रेंट), और स्टाफ़िंग (एसआईएस, टीम-लीज़), कॉंट्रैक्ट मैन्युफ़ैक्चरर (डिक्सन, अंबर), लॉजिस्टिक्स (ब्लू डार्ट एक्सप्रेस, वीआरएल लॉजिस्टिक्स) स्क्रीनर के प्लेयर, ये सब भी लो-मार्जिन बिज़नस में ही फ़िट होते हैं इसलिए ये सब भी बाहर हो जाएंगे। इससे भी बड़ी बात ये है, कि आप ऐसा कर के खुद को उन अवसरों से वंचित कर देंगे जो भारत के बेहतर ट्रेंड करने वाले सबसे अच्छे विकल्प हैं। रोचक ये भी है कि इनमें से ज़्यादातर स्टॉक पिछले कुछ साल में मल्टी-बैगर रहे हैं।

तो ये उलझन है कहां? सहज बात तो ये है कि कम ईबीआईटी वाले बिज़नस में, इन्ट्रस्ट और इन्कम-टैक्स के बाद इक्विटी शेयरहोल्डर के लिए थोड़ा प्रॉफ़िट ही बचना चाहिए। मगर हम पाते हैं कि यही बात ईबीआईटी निवेशकों के लिए सबसे आकर्षक फ़ीचर बन जाता है, और उन्हें फ़ायदा हासिल करने में मदद करता है। आखिर ये कैसे होता है, ये समझने के लिए कैपिटल पर रिटर्न के तरीकों को समझना चाहिए।
वॉरेन बफ़ेट का कहना है, "एक आदर्श बिज़नस वो है जिसमें कैपिटल पर बहुत ऊंचे रिटर्न मिलते हों, और वो काफ़ी सारा कैपिटल, उन ऊंचे रिटर्न के लिए इस्तेमाल करता हो। इससे एक कंपाउंडिंग मशीन बन जाती है।"

कैपिटल पर रिटर्न = ईबीआईटी/ इस्तेमाल किया हुआ कैपिटल
ईबीआईटी/ इस्तेमाल किया हुआ कैपिटल = (ईबीआईटी/ सेल) x (सेल/ इस्तेमाल किया हुआ कैपिटल) = ऑपरेटिंग मार्जिन x कैपिटल टर्न-ओवर

तो अगर कोई बिज़नस कैपिटल के रिटर्न पर कम मार्जिन कमाता है, और किसी तरह वो अपना कैपिटल टर्नओवर बढ़ा पाता है (कैपिटल के मुकाबले प्रति यूनिट सेल) तो ये ऐसी स्थिति बना देगा जिसमें कैपिटल पर ऊंचा रिटर्न मिले और इसी से बनेगा कंपाउंडिंग इफ़ेक्ट।


कंपनी के कम मार्जिन पर काम करते रहने की क्षमता केवल तभी बेहतर स्थिति में रह सकती है, अगर कंपनी के पास कोई ख़ास बढ़त हो (सुरक्षा-घेरा)। ये बढ़त काम के तौर-तरीकों, तकनीक या लोगों की हो सकती है। जब ऐसा बार-बार होता रहता है तो ये एक फ्लाई-व्हील (मोटर से जुड़ा पहिया) की तरह काम करता है।

उसके बाद होता ये है कि वो साल-दर-साल सफल प्लेयर्स को सामान्य से ज़्यादा फ़ायदा दिलाता है और प्रतिद्वंदियों को खत्म कर देता है।

तो आइडिया ये है कि ऐसी कंपनियों को पहचाना जाए, जो नैसर्गिक रूप से कम मार्जिन कमा रही हों मगर जिन्हें किसी खास तरह की बढ़त हासिल हो जो उन्हें कैपिटल की ज़रूरत को कम रखते हुए, टर्नओवर बढ़ाने में मदद करे। अगर ऐसी कोई कंपनी आपको मिले तो समझ लीजिए कि वो विजेता साबित होगी!

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