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ख़तरनाक IPOs

हाल ही में फ़ोन पर हुई एक बातचीत लीक हो गई, और इसमें जो कुछ सामने आया है वो हाई-वैल्यू IPOs पर दांव लगाने के अजीब खेल को उजागर करता है।

हाल ही में फ़ोन पर हुई एक बातचीत लीक हो गई, और इसमें जो कुछ सामने आया है वो हाई-वैल्यू IPOs पर दांव लगाने के अजीब खेल को उजागर करता है।


हाई फ़ाईनांस, यानि बड़ी रक़म का लेन-देन एक गला-काट प्रतियोगिता वाला बिज़नस है। इसके बावजूद, एक बैंक सेल्समैन और एक अमीर क्लाएंट की बातचीत का ये ऑडियो क्लिप, अचंभे में डालने वाला है। ये कहानी कुछ अजीब लगती है - जिसमें एक हाई-प्रोफ़ाईल फ़िन-टेक एग्ज़ीक्यूटिव, एक बैंक कर्मचारी को गालियां और धमकी दे रहा है - और इसलिए, क्योंकि बैंक ने उसे नायका के IPO में लगाने के लिए टेंपरेरी लोन (कम अवधि का लोन) नहीं दिया। बात यहीं पर नहीं रुकती है। बातचीत के दौरान, पुलिस एनकाउंटर में हत्या करवा देने जैसी धमकी भी दी जाती है। पिछले कुछ दशकों में IPO से जुड़ी, कई अजीबोग़रीब कहानियां मैंने सुनी हैं, मगर बिना किसी शक़ के, ये कहानी सबसे अजीब है। मैं सोच रहा हूं कि क्या होता, अगर ये IPO पेटीएम का होता और लोन दे दिया जाता। असल में, अगर बैंक इस तरह के लोन देते हैं, तो पेटीएम IPO के लिए भी किसी ने तो लोन दिया होगा। और अब शायद वो बैंक को धमका रहा होगा कि आपने लोन देने से मना क्यों नहीं किया। ...ख़ैर, इस सब का अंदाज़ा लगाना बेकार है।
इस घटिया स्तर की बातचीत ने लोगों का कुछ मनोरंजन तो ज़रूर किया, मगर असल में बड़ा सवाल निवेश के माहौल में आए पतन का है। हालांकि, कोई पलट कर ये भी कह सकता है कि अगर निवेश क़ानून के दायरे में किया जा रहा है, तो इसे करने की पूरी आज़ादी है। एक तो IPOs होते हैं, और एक निवेशक होते हैं जो उनपर दांव लगाना चाहते हैं और फिर उसकी लिस्टिंग होने पर उसे बेचना चाहते हैं। इसके अलावा वो होते हैं - जो लोन देने के बिज़नस में हैं। अगर ये सब लोग एक साथ मौजूद हैं, तो उनका मिल जाना भी स्वाभाविक ही है, फिर चाहे कोई तरीक़ा समझदारी से निवेश करने या लोन देने का हो, या न हो।
अगर कुछ हो सकता है, तो लोग करेंगे। हालांकि, अक्सर लोग वही करते हैं जो आसानी से किया जा सकता है और जिस काम के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है। संयोग से हाल ही में, मैंने एक आर्टिकल पढ़ा जिसमें एक स्टडी के बारे में बात की गई थी। उसमें कहा गया कि किसी चीज़ का मौजूद होना ही व्यवहार को प्रभावित करता है। फिर चाहे उसका कोई ट्रिगर (प्रेरणा) हो या न हो। ये स्टडी, खाने और कसरत को लेकर थी (ज़ाहिर है, क्योंकि ये स्टडी अमेरिका में हुई थी)।
इस स्टडी में पता चला कि जो लोग, जिम के काफ़ी नज़दीक रहते थे उन्होंने जिम का इस्तेमाल कहीं ज़्यादा किया। बजाए उन लोगों के जो थोड़ा दूर रहते थे। चाहे इस दूरी का फ़र्क़, सिर्फ़ एक या दो मील का ही था। जिम की उपलब्धता में ज़रा से फ़र्क़ ने ही लोगों का व्यवहार बदल दिया। एक और स्टडी, जो एक इन्टरवेंशन स्टडी लगती है, (ऐसी स्टडी, जो परिस्थिति में हस्तक्षेप के असर का अध्ययन करे)। इस स्टडी में पाया गया कि स्कूलों के बाहर और कम्यूनिटी एरिया में सब्ज़ियों का स्टैंड लगाए जाने पर, वहां रहने वालों ने बजाए जंक फ़ूड के, सब्ज़ियां ज़्यादा खाईं। उनके व्यवहार में आया ये बदलाव इस बात के बावजूद हुआ, कि लोगों को अपने खाने की आदत बदलने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं दिया गया। यानि सब्ज़ियों के स्टॉल को प्रमोट करने के लिए कुछ नहीं किया गया। इसका मतलब साफ़ है: अगर आप चाहते हैं कि लोग अलग तरह से व्यवहार करें, तो इसके लिए परिस्थितियों को बदलना होगा। यानि ये ज़रूरी होगा कि लोगों को नए विकल्प दिए जाएं। इसकी वजह ये है कि हम अपना बहुत सारा निर्णय, ज़ाहिर तौर पर सोच कर नहीं करते। बल्कि ये एक तरह का ऑटोमैटिक रिस्पॉंस है, यानि स्वतः होने वाली प्रक्रिया है।
जैसा होता ही है, कि हम लगातार ऐसे माहौल में रहते हैं, जो - बचत, निवेश, और समझदारी से निवेश करने जैसी बातों के ख़िलाफ़ है। आप अपने आसपास, लगातार मिलने वाली जानकारियों को ध्यान से देखें - टीवी, इंटरनेट, न्यूज़पेपर, मार्केट, मॉल और यहां तक की हमारी बातचीत। इसमें से कितना कुछ, पैसे ख़र्च करने के बारे में होगा और कितना, बचत या कम-से-कम ख़र्च न करने के बारे में होगा। इसे लेकर, आप ख़ुद एक सर्वे करने की कोशिश कीजिए। हमारी आम बातों में ख़र्च और बचत के बीच असंतुलन का अनुपात आपको हैरान कर देगा। इससे भी बड़ी बात ये है, कि अगर आप बचत करने वाले और निवेशक बन भी जाते हैं, तो आपको ऐसे निवेश की तरफ़ ले जाया जाएगा, जो या तो अटकलों पर आधारित है, या बहुत तेज़ी से नतीजे देने का दावा करता है। और जैसा कि हम बहुत अच्छे से समझते हैं - किसी चीज़ की उपलब्धता ही उसके चुनाव की दिशा तय करती है। हालांकि ये बात हर किसी पर फ़िट नहीं बैठती, क्योंकि बहुत से लोगों की इच्छाशक्ति मज़बूत होती है, और वो वातावरण के दबावों को नकार सकते हैं। मगर ये भी सच है कि ऐसे लोगों की संख्या ज़्यादा नहीं है।
तो आईए एक बार फिर, उसी तरह के IPO में दांव लगाने की बात पर वापस लौटते हैं, जिसकी बात इस बदनाम हो चुके फ़ोन कॉल में हो रही है। हत्या की धमकी या इसमें शामिल व्यक्ति के बारे में हमें जो भी लगे, उससे कहीं बड़ा और कहीं ज़रूरी मुद्दा है, - IPOs और स्टॉक्स में निवेश का माहौल। यही वो बड़ा, और अहम मुद्दा है जो ग़लत दिशा की तरफ़ जा रहा है।

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