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एक असंभव सा IPO संकट

क्या ऐसे IPOs के दाम तय करने का कोई तरीक़ा है जिन्होंने कभी भी मुनाफ़ा कमाया ही न हो?

क्या ऐसे IPOs के दाम तय करने का कोई तरीक़ा है जिन्होंने कभी भी मुनाफ़ा कमाया ही न हो?

NATC, एक ताज़ा-ताज़ा रखे गए नाम का सार (acronym) है, और इसे सेबी का वरदहस्त भी प्राप्त हो गया है। दरअसल सेबी ने IPO पर लिखे अपने कंसल्टेशन पेपर में इस नाम का ज़िक्र किया है जिसका शीर्षक है, ‘डिस्क्लोज़र्स फ़ॉर बेसिस ऑफ़ इशू प्राईज़ सेक्शन इन द ऑफ़र डॉक्यूमेंट’। इस नाम का मतलब है, ‘न्यू एज टेक्नोलॉजी कंपनी’, जो बदक़िस्मती से इस नाम का कोई सही मायने ज़ाहिर नहीं करता। तब इतना बुरा नहीं होता, अगर इसे CTHNMAPAPNS जैसा कोई नाम दिया गया होता। अगर ये नाम मिलता तो इसका अर्थ कुछ इस तरह से होता, ‘कंपनी दैट हैज़ नेवर मेड ए प्रॉफ़िट एंड प्रॉबेब्ली नेवर शैल’ यानि, ‘कंपनी जिसने कभी मुनाफ़ा नहीं कमाया है और शायद कभी कमाए भी नहीं’। ये नाम कम-से-कम ‘न्यू एज टेक्नोलॉजी कंपनी’ जैसा अस्पष्ट और बेमानी तो नहीं लगता। तब इसका एक सही और सटीक अर्थ होता जो निवेशक की समझ में भी आता। असल में, मेरे सुझाए इस नाम में, IPO कंपनी का, बड़े काम का तथ्य भी छुपा है जिसका पता हर निवेशक को होना चाहिए।
तो इस कॉलम में हम CTHNMAPAPNS की चर्चा करेंगे। सेबी के इस कंस्ल्टेशन पेपर की ज़रूरत ही इसलिए पड़ी, क्योंकि इन कंपनियों ने कभी मुनाफ़ा नहीं कमाया। अतंतोगत्वा, किसी भी कंपनी के स्टॉक के सही दाम तय करने के सारे मौजूदा मापदंड इसी बात से निर्धारित होते हैं कि कोई भी कंपनी कितना मुनाफ़ा कमाती है। इसी बात से आप ये अंदाज़ा लगा सकते हैं कि भविष्य में अपने निवेश से आप कितना धन कमा पाएंगे और आपका फ़ैसला कितना क़ारगर साबित होगा।
सच तो ये है कि क़ागज़ों के मोटे गठ्ठरों में, आपका जो भी अनालेसिस, पब्लिक होने वाली-या पब्लिक हो चुकी कंपनियों को लेकर होता है-वो उन्हीं के लिए होते हैं जिन कंपनियों ने मुनाफ़ा कभी नहीं कमाया हो। नोट करें, मैं कह रहा हूं मुनाफ़ा ‘कभी नहीं’ कमाया हो। ऐसी बहुत सी कंपनियां हैं जो कभी-कदार घाटे में चली जाती हैं मगर उन्हें इवैलुएट करना मुश्किल नहीं है। मगर जब बात, ‘कभी नहीं’ की हो, तो ये स्पेशल केस बन जाता है। असल में, तब तो और भी ज़्यादा स्पेशल केस हो जाता है-जब बात उन कंपनियों की बात हो, जिनके बिज़नस में कभी किसी ने, पूरी दुनिया में, कहीं भी मुनाफ़ा नहीं कमाया हो।

ये फ़र्क़ करना बेहद ज़रूरी है। मिसाल के तौर पर, भारत में सदा घाटे में रहने वाली ई-कॉमर्स या डिलिवरी कंपनियां हैं। हालांकि, जब आप दुनिया में दूसरी जगह देखते हैं, तो पाते हैं कि कुछ ऐसी कंपनियां हैं, जो मुनाफ़े में चल रही हैं। इससे ये पक्का हो जाता है कि ये बिज़नस तो सही है, और इससे निवेशकों के लिए एक तरह का बेंचमार्क तैयार हो जाता है। हालांकि, जब ओला या ज़ोमाटो या पेटीएम जैसे बिज़नस की बात आती है, तब ये काम नहीं आता। दुनिया में कहीं भी और कोई भी, ऐसे बिज़नस में मुनाफ़ा नहीं कमा पाया है।

सेबी के कंसल्टेशन पेपर में इसी पर चर्चा है और इसमें कुछ प्रस्ताव भी सामने रखे गए हैं जिसपर सार्वजनिक चर्चा हो सके। ये प्रस्ताव कुछ ऐसे अहम संकेतों की बारे में है जो इस तरह के बिज़नस के प्रदर्शन के लिए एक मापदंड का काम कर सकते हैं (key performance indicators or KPI). बुनियादी तौर पर इसमें कहा गया है कि इशु जारी करने वाली कंपनी को अपना पिछला KPI सार्वजनिक करना होगा, जिसका इस्तेमाल IPO से पहले के निवेशकों ने कंपनी के में निवेश के लिए किया हो। उन KPI के प्वाइंट्स को साफ़ तौर पर रेखांकित करना होगा जो इशू के प्राईस को तार्किक बनाते हों। KPI के नियामक तय करने वाले ऑडिटर, इसे सर्टिफ़ाई या ऑडिट करेंगे। भारत में लिस्टिड एक ही तरह की कंपनियों में, या एक जैसी विदेशी कंपनियों के बीच तुलना की जाएगी, और KPI की इस तुलना को एक अर्से के दौरान सरलता से लोगों के सामने रखा जाएगा।

ये सब सही ही लगता है, अगर ऐसा हो सके, और अगर इसे रेग्युलेट किया जा सके, और ये बहुत बड़े ‘अगर’ हैं। इस समस्या के केंद्र में बात ये है कि कंपनियों को पिछले KPI से जुड़ी बातचीत और संवाद साझा करने होगें, जो उन्होंने वेंचर कैपिटलिस्ट और फ़ंड्स के साथ किए होंगे। तो इसका मतलब हुआ कि हम कंपनियों द्वारा, ईमानदारी से अपनी पिछली प्राईवेट जानकारियां साझा करने पर निर्भर होंगे। और वो भी तब, जब ये जानकारी वेरिफ़ाई नहीं की जा सकती, बल्कि सिर्फ़ बातचीत तक ही सीमित हो। क्या ये काम करेगा? मैं इस सवाल को हवा में ही लटके रहने देना चाहूंगा। अगर आपका CTHNMAPAPNS में निवेश करने का कोई इरादा है, तो ख़ुद अपने फ़ायदे के लिए, इसका जवाब देने के लिए आपका स्वागत है।

अंत में, भारत में IPO के लिए ऐसी कंपनियों की प्राईसिंग तय करना एक मुश्किल काम है, शायद असंभव भी हो। एक तरफ़, मौजूदा शेयर होल्डर और इन्वेस्टमेंट बैंकर हैं और दूसरी तरफ़ निवेश करने वाले लोग, जिनके बीच हितों का ये टकराव, काफ़ी बड़ा है और ऐसी जानकारी जिसे जांचा-परखा जा सके, बहुत ही कम। इस तरह का निवेश प्रोफ़ेशनल्स को ही करना चाहिए जो इस बिज़नस में हैं और जो टेबल के आमने-सामने पर बैठ कर मज़बूती से मोल-भाव कर सकते हैं। आम रिटेल निवेशक जिन्हें बिना विकल्प के ख़रीदो-या-छोड़-दो की तर्ज़ पर IPO डील मिलती हैं, उन्हें इसे छोड़ ही देना चाहिए। इस समंदर में और भी बहुत सी मछलियां हैं।

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