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स्टॉक मार्केट की मुश्किल नई नहीं

इस पर कोई बहस नहीं हो सकती कि इक्विटी मार्केट में चल रही मुश्किलें और गहराएंगी या लंबी खिंचेंगी या फिर ये दोनों ही बातें होंगी। लेकिन एक बात पक्के तौर कही जा सकती है कि ये उस तरह की मुश्किल होगी जिसे निवेशक पहले भी देख चुके हैं

इस पर कोई बहस नहीं हो सकती कि इक्विटी मार्केट में चल रही मुश्किलें और गहराएंगी या लंबी खिंचेंगी या फिर ये दोनों ही बातें होंगी। लेकिन एक बात पक्के तौर कही जा सकती है कि ये उस तरह की मुश्किल होगी जिसे निवेशक पहले भी देख चुके हैं

इक्विटी मार्केट क्रैश कर रहा है। पर चिंता न करें, ये एक ईमानदार क्रैश है। आप शायद पूछेंगे, ये ईमानदार क्रैश क्‍या होता है? इसे समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि बेईमान क्रैश क्‍या होता है। 90 के दशक के अंत तक, भारत के इक्विटी मार्केट में सभी बड़ी गिरावटों के पीछे किसी घोटाले का खुलासा था।

या यूं कहें कि इक्विटी मार्केट में बूम आना ही एक एक घोटाला था। और जब घोटाले का पता चला तो मार्केट क्रैश हो गया या इसे छिपाना संभव नहीं रह गया। 1992 में हर्षद मेहता बूम, 90 के दशक के मध्‍य में आया IPO बूम, और इसी दशक के आख़िरी दौर में टेक- स्‍टॉक्‍स के लिए मारा-मारी के मामले में ये बात सच है। ये सब, 1991 में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण का साइड इफ़ेक्ट था। बुनियादी तौर पर आर्थिक आज़ादी आ चुकी थी, लेकिन यह एकतरफ़ा थी। न तो ज़रूरी रेग्‍युलेटरी फ्रेमवर्क था, और न ही निवेश करने वाली पब्लिक मैच्‍योर थी।

मुझे नहीं लगता कि जो कुछ भी हो रहा है उसके लिए क्रैश शब्‍द का इस्‍तेमाल करना सही है, कम- से- कम भारतीय इक्विटी मार्केट के लिए तो सही नहीं है। इस समय भी--13 जून,2022--को जब मैं यह ये लेख लिख रहा हूं, तो सेंसेक्‍स पिछले 1 साल के अर्से में पॉज़िटिव रहा है, निफ्टी दशमलव प्‍वाइंट में नेगेटिव, और स्‍माल व मिड-कैप इंडेक्‍स मुश्किल से नेगेटिव हैं। यहां इक्विटी म्‍यूचुअल फ़ंड पर ग़ौर करने से तस्‍वीर और साफ़ हो जाती है। अगर आप वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन Value Research Online पर जाते हैं और सभी डायवर्सीफाइड इक्विटी फ़ंड देखते हैं, तो आप पाएंगे कि 328 लिस्‍टेड फ़ंड्स में से 264 फंड्स का एक साल का रिटर्न पॉज़िटिव है।

पिछले सभी क्रैश, जिनके बारे में मैंने बात की है, उनके लिहाज़ से यह ये कुछ भी नहीं है, सिर्फ छोटा सा झटका है। मैं ये नहीं कहा रहा कि ये स्थिति बिगड़ नहीं सकती, लेकिन मेरा मानना है कि बिना वजह फैलाया जा रहा है। निश्चित तौर पर चिंता करने की कुछ वजहें तो हैं, और जैसा कि मैंने ऊपर कहा है कि कुछ मनोवैज्ञानिक वजहें भी हैं, जैसे - अचानक आए चीनी वायरस का असर और यूरोप की जंग ने बहुत से लोगों को झटका दिया है और आम तौर पर लोग भविष्‍य को लेकर ‍फ़ि‍‍क्रमंद हैं। ये सारी बातें कोई-न-कोई भूमिका ज़रूर निभा रही हैं। बिटकॉइन और दूसरी क्रिप्‍टो करंसी की अजीब समस्‍या का भी नकारात्‍मक असर है।

हालांकि आधुनिक भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था और इक्विटी मार्केट के सफ़र को अब तीन दशक हो गए हैं और अगर इससे कुछ सीखने वाली बात की है, तो वो ये कि समय उतार-चढ़ाव वाला है और सभी फ़ायनेशियल मार्केट्स में गहरी अनिश्चितता और डर है। हालांकि, जिस किसी ने भी भारतीय इक्विटी मार्केट में पहले की तीन या चार गहरी अनिश्चितताओं का को व्‍यक्तिगत तौर पर अनुभव किया है, वो इस बात को मानने से मना कर देगा कि 2008 के बाद से निवेश के फ़ंडामेंटल बदल गए हैं। ‘इस बार ये अलग है’ का जुमला, इतना झूठा पहले कभी नहीं लगा था जितना इस बार लग रहा है।

सभी अनुभवी निवेशकों ने यह देखा है कि निवेश में बड़ी सफलता की नींव बुरे दौर में ही रखी जाती हैं। बुरा समय ही वो दौर होता है जब आपको बिना डरे, लेकिन सोच- समझ कर निवेश करना चाहिए, जिससे अच्‍छा समय लौटने पर आप मुनाफ़े की फ़सल काट सकें। बीते दशकों में यही हुआ है, संकट दूर हुआ है और अर्थव्‍यवस्‍थाओं ने मज़बूत वापसी की है।




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