Illustration: Anand Kumar
भारत में म्यूचुअल फ़ंड जिस तरह से बेचे और ख़रीदे जाते हैं उसमें एक नया अध्याय जुड़ गया है. पिछले हफ़्ते, फ़ाइनेंशियल रेग्युलेटर सेबी (SEBI) ने एक नई तरह की फ़ंड बेचने वाली संस्था का समर्थन किया जिसे 'Execution Only Platforms' कहते हैं. यानी, ऐसे प्लेटफ़ॉर्म जिनका काम सिर्फ़ फ़ंड में निवेश को अंजाम देने में मदद करना हो. ध्यान देने वाली बात है कि ये 'EOP' पहले से मौजूद थे और अब उनकी मौजूदगी को एक तरह से स्वीकार किया जा रहा है.
इसके निवेशकों और म्यूचुअल फ़ंड (Mutual Fund) इंडस्ट्री के लिए क्या मायने है, इसे अच्छी तरह से समझने के लिए हम एक-एक कर के कुछ बदलावों के ज़रिए समझने की कोशिश करेंगे.
स्टेज 1: कभी फ़ंड डिस्ट्रीब्यूटर हुआ करते थे (यानी 2009 से पहले). यूनिट ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया के इन पुराने दिनों में और पूरे 90 के दशक में इंश्योरेंस एजेंट की तरह ही इंडिविजुअल एजेंट हुआ करते थे. जो बात मायने रखती है वो ये कि ये एजेंट, फ़ंड कंपनी के एजेंट होते थे. फिर 90 के दशक के दौरान फ़ंड बेचने वाली इंडस्ट्री कॉर्पोरेट इंडस्ट्री में तबदील होती गई, मगर पुराना मॉडल पहले जैसा ही रहा. निवेशक का पैसा फ़ंड कंपनी के पास जाता था और फ़ंड कंपनी एजेंट को कमीशन देती थी. आमतौर पर, निवेश के लिए दिए गए शुरुआती पैसे में से कुछ पैसा काट लिया जाता था. इसे 'एंट्री लोड' कहते थे और ये कमीशन देने के काम आता था.
ये भी पढ़िए- रजनीकांत स्टाइल: कैसे एक म्यूचुअल फ़ंड ने दिया 20% से ज़्यादा मुनाफ़ा
स्टेज 2: साल 2009 में, SEBI ने एंट्री लोड ख़त्म कर दिया, जिससे फ़ंड्स कमीशन का पैसा अपनी जेब से देने के लिए मजबूर हो गए. इस फ़ैसले में माना गया कि ये कमीशन, डिस्ट्रीब्यूटर द्वारा फ़ंड कंपनी को दी जाने वाली सर्विस के लिए था. डिस्ट्रीब्यूटर सलाह देते थे, और ये सलाह कमीशन को ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ाने के लिए दी जाती थी. और क्योंकि निवेश की शुरुआत में ही ज़्यादातर कमीशन ले लिया जाता था, इसलिए निवेशक से होल्डिंग में बदलाव कराना एक ग़लत प्रथा थी.
स्टेज 3: साल 2013 में, SEBI ने सभी म्यूचुअल फ़ंड स्कीमों को एक 'डायरेक्ट' प्लान शुरू करने के लिए मजबूर किया. इस प्लान में, निवेशक सीधे फ़ंड कंपनी या उसके रजिस्ट्रार से डील करते थे. इसके अलावा कोई बिचौलिया (intermediary) नहीं था, और फ़ंड कंपनी रेग्युलर प्लान (non-direct) के कमीशन के तौर पर जो फ़ीस चार्ज करती थी, अब वो नहीं ली जा सकती थी. निवेशकों को पहली बार, ऐसा विकल्प मिला था जहां बिला बिचौलिए के ज़्यादा रिटर्न लिया जा सकता था.
इसी समय, SEBI ने डिस्ट्रीब्यूटर और इन्वेस्टमेंट एडवाइज़र को अलग कर दिया. डिस्ट्रीब्यूटर फ़ंड कंपनी के एजेंट हैं और उन्हें कंपनी द्वारा पैसे मिलते हैं. इन्वेस्टमेंट एडवाइज़र, इन्वेस्टर के लिए काम करते हैं और उन्हें इन्वेस्टर पैसे देते हैं.
ये भी पढ़िए- कैसा हो पहला Mutual Fund? जिसमें आपको अमीर बनाने का हो दम
इस पूरे ढांचे के पीछे की सोच का कारण अब साफ़ है. आप तीन चीज़ें कर सकते हैं: अगर आपको पूरी मदद चाहिए और आप दूसरी किसी चीज़ की परवाह नहीं करते, तो आप एक डिस्ट्रीब्यूटर के पास जा सकते हैं. या, आप एक निवेश सलाहकार या इन्वेस्टमेंट एडवाइज़र को उसकी सलाह और गाइडेंस के लिए पैसे दे सकते हैं और फिर अपना ट्रांज़ैक्शन सीधे ख़ुद कर सकते हैं. या फिर, आप अपनी रिसर्च ख़ुद कर सकते हैं और सीधे ट्राज़ैक्शन कर सकते हैं, जिसमें अपने रिटर्न को बढ़ाने या घटाने के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार होंगे मगर इस तरीक़े से अपने रिटर्न ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ा सकते हैं और ख़र्च को बेहद कम कर सकते हैं. आख़िरी के दो विकल्पों में, सीधे ट्रांज़ैक्शन का मतलब है या तो फ़ंड कंपनियों (ऑनलाइन या ऑफ़लाइन) के ज़रिए या AMFI, MF सेंट्रल जैसे प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए अपना निवेश कर सकते हैं जो पूरी इंडस्ट्री के लिए काम करते हैं.
हालांकि, पिछले तीन-चार सालों में, इस चिड़ियाघर में एक नया पंछी आया है. ये ऐसे बिज़नस हैं, जो न तो एडवाइज़र है और न ही डिस्ट्रीब्यूटर. ये निवेश करने वालों के लिए डिजिटल सर्विस चला रहे हैं और डायरेक्ट प्लान के लिए लेन-देन की सुविधा देते हैं मगर इसके लिए कोई पैसा नहीं लेते. मुश्किल ये है कि अब तक के नियमों के मुताबिक़, ये रेग्युलेटर की इंटरमीडियेरी की किसी परिभाषा में फ़िट नहीं होते, और ये जिस तरह काम करते हैं वो भी रेग्युलेशन के दायरे में नहीं आता. मगर फिर भी, इन्होंने एक ज़रूरत को पूरा किया है और निवेशकों के बीच लोकप्रिय हो गए हैं.
जहां SEBI के इस नए रेग्युलेशन पर अमल होने में कुछ महीने लेगेंगे. वहीं, इसने इंटरमीडियेरी की ऐसी क्लास खड़ी कर दी है जो निवेशकों के लिए लेन-देन करेंगे और चाहेंगे तो अपनी सेवाओं की फ़ीस भी लेंगे. वो AMC से न तो कोई सलाह लेंगे और न ही कोई कमीशन लेंगे. इस रेग्युलेशन में ये भी ज़रूर झलकना चाहिए कि इंटरमीडियेरी कर क्या रहे हैं. हालांकि, अब सवाल ये है कि ये संस्थाएं अपनी कमाई के लिए और क्या करेंगी कि फ़ंडिंग ख़त्म हो जाने के बाद भी उनका ख़र्च कैसे चलेगा. पर ये तो एक अलग ही कहानी है.
देखिए ये वीडियो- ₹10 लाख कैसे निवेश करें?






