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डर, लालच और घबराहट

यह ऐसा दौर है, जब हमें गुरु बफ़े की सीख अपनाने की ज़रूरत है

यह ऐसा दौर है, जब हमें गुरु बफ़े की सीख अपनाने की ज़रूरत हैAditya Roy/AI-Generated Image

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काफ़ी पहले की बात है - बिज़नेस TV और अख़बारों पर मिलने वाली निवेश सलाह बिल्कुल आज की तरह बेहद नकारात्मक हो गई थी. सबकी एक ही राय थी: सब कुछ बर्बाद होने वाला है. समस्याओं की फ़ेहरिस्त लंबी और डरावनी थी. तेल की क़ीमतें थमने का नाम नहीं ले रही थीं. महंगाई दर बढ़ रही थी और साथ ही महंगाई की उम्मीदें भी, जो कथित तौर पर और भी बुरी बात थी. ख़ासे डर का माहौल था. आज भी हालात कुछ ऐसे ही हैं.

इक्विटी और इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करने वाले लोगों के मन में स्वाभाविक सवाल उठता है कि अभी क्या करें. इसके जवाब में सबसे बेहतर बात जो मेरे ज़ेहन में आती है, वो है महान निवेशक वॉरेन बफ़े का एक मशहूर कथन (कोट)- जब दूसरे लालची हों तो डरो, और जब दूसरे डरे हों तो लालची बनो. सुनने में यह बड़ा चतुराई भरा और 'पोस्टर के लायक' लग सकता है, लेकिन बफ़े की हर बात की तरह इसमें भी उससे कहीं ज़्यादा गहराई है जितनी पहली नज़र में दिखती है.

ज़ाहिर है, अभी दूसरे डरे हुए हैं. तो क्या यह लालची बनने का वक़्त है? शायद हां. एक पुराने इंटरव्यू में बफ़े ने शेयर बाज़ार की गिरावट के दौरान निवेशकों को क्या करना चाहिए - इस सवाल के जवाब में कुछ बहुत दिलचस्प बात कही. उनके शब्द थे: "असल में, आप नहीं चाहते कि निवेशक यह सोचें कि आज जो वो पढ़ रहे हैं वो उनकी निवेश स्ट्रैटेजी के लिए ज़रूरी है. उनकी निवेश स्ट्रैटेजी में यह बात शामिल होनी चाहिए कि (क) अगर आपको पता भी हो कि अर्थव्यवस्था में क्या होने वाला है, तो भी ज़रूरी नहीं कि आप जानते हों शेयर बाज़ार में क्या होगा. और (ख) वो औसत से बेहतर स्टॉक नहीं चुन सकते. स्टॉक्स लंबे समय तक रखने के लिए अच्छे होते हैं. ग़लतियां सिर्फ़ दो तरह की हो सकती हैं: ग़लत स्टॉक ख़रीदना, या ग़लत वक़्त पर ख़रीदना या बेचना. और सच तो यह है कि आपको बेचने की ज़रूरत कभी पड़ती ही नहीं. लेकिन वो अमेरिकी उद्योग का एक व्यापक हिस्सा ख़रीद सकते हैं. और अगर उद्योग का वो व्यापक हिस्सा काम नहीं करता, तो यहां-वहां 'छोटे रत्न' खोजने की कोशिश भी काम नहीं करेगी. फिर उन्हें बस लालच से बचना होगा. मैं हमेशा कहता हूं जब दूसरे डरें तो लालची बनो और जब दूसरे लालची हों तो डरो. लेकिन यह बहुत ज़्यादा मांगना है. कम से कम यह तो करो - जब दूसरे लालची हों तो लालची मत बनो, और जब दूसरे डरें तो डरो मत."

इन शब्दों में बस 'अमेरिका' की जगह 'भारतीय' रख लीजिए, फिर ध्यान से पढ़िए. यह इतना अलग है उस सोच से जो ज़्यादातर लोग निवेश के बारे में रखते हैं कि समझने में वक़्त लगता है कि यह कामयाब बुज़ुर्ग आख़िर कह क्या रहे हैं. वो कह रहे हैं कि निवेश की लंबी कामयाबी इस बात पर नहीं टिकी कि निवेशक 'छोटे नगीने' खोज लेगा, बल्कि इस बात पर टिकी है कि देश की अर्थव्यवस्था बढ़ेगी. अभी जो हो रहा है - यानी छोटी अवधि की ख़बरें - वो अहम नहीं हैं, क्योंकि आप जो भी सुनें, इस वक़्त देश और अर्थव्यवस्था में जो हो रहा है वो इस बात का अच्छा संकेत नहीं हो सकता कि आने वाले थोड़े वक़्त में शेयर बाज़ार में क्या होगा. बाज़ार को प्रभावित करने वाले बहुत सारे पहलू हैं, बहुत शोर है - जो एक आम निवेशक के समझ से परे है.

लेकिन लंबे समय में यह सारा शोर ख़त्म हो जाता है, और आप एक ही सवाल पर आ जाते हैं: क्या देश की अर्थव्यवस्था बढ़ेगी? अगर आपका जवाब हां है, तो यही काफ़ी वजह है कि आप स्टॉक का एक व्यापक हिस्सा ख़रीदें और रखें. और बोनस यह है कि चूंकि यह वो वक़्त है जब दूसरे डरे हुए हैं, इसलिए बहुत-से निवेश कुछ ही वक़्त पहले की तुलना में काफ़ी सस्ते हो गए हैं.

यह भी पढ़ेंः इस बार जल्द ख़त्म नहीं होगा मुश्किल दौर!

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