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हिंडनबर्ग का खेल: शॉर्ट-सेलिंग और राजनीतिक हस्तक्षेप

इस रिसर्च फ़र्म का सेबी को निशाना बनाना, कभी फ़ाइनेंशियल एक्टिविज़्म लगा करता था, अब वही भारत की आर्थिक संप्रभुता में सीधा-सीधा हस्तक्षेप हो गया है

इस रिसर्च फ़र्म का सेबी को निशाना बनाना, कभी फ़ाइनेंशियल एक्टिविज़्म लगा करता था, अब वही भारत की आर्थिक संप्रभुता में सीधा-सीधा हस्तक्षेप हो गया हैAnand Kumar

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हिंडनबर्ग की मुहिम पर किसी भी व्यक्ति के दो अलग नज़रिए हो सकते हैं.

1. हिंडनबर्ग एक इक्विटी रिसर्च की संस्था है जो नकारात्मक रिसर्च करने में माहिर है. ये ओवरवैल्यूड कंपनियों के ख़िलाफ़ गंदगी खोद कर लाती है, उन शेयरों को शॉर्ट करती है, अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करती है, और इस तरह (बहुत सारा) पैसा कमाती है. ये आम तौर पर बाज़ारों की भी मदद करती है क्योंकि कंपनियों के लिए सही तरीक़े से मूल्यांकन किया जाना अच्छा है और उनका ओवरवैल्यूड होना बुरा. 2023 की शुरुआत में अडानी समूह के शेयरों के ख़िलाफ़ इसकी रिपोर्ट की प्रकृति ऐसी ही थी.

2. हिंडनबर्ग ने भारत के सबसे बड़े व्यापारिक समूहों और सरकार को बदनाम करने के लिए एक राजनीतिक अभियान के हिस्से के तहत, ख़ासतौर पर अडानी समूह को निशाना बनाया, और इस पूरी क़वायद में, इसने इन शेयरों को शॉर्ट करके बहुत सा पैसा कमाया.

  • हिंडनबर्ग सेबी चेयरपर्सन के ख़िलाफ़ आरोप लगाकर सेबी की जांच को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है. इस प्रक्रिया में, इसने भारतीय बाज़ारों को शॉर्ट करके फिर से पैसा बनाने की कोशिश की.

2023 में एक समय तक, कई लोगों को लगा कि ऊपर दिया गया प्वाइंट-1 ज़्यादातर सही था. उस समय भारत में एक महत्वपूर्ण कहानी चल रही थी कि हिंडनबर्ग की मुख्य भूमिका भारतीय लोकतंत्र को बचाने की कोशिश करने वाले एक योद्धा की थी या फिर कुछ इसी तरह की बकवास थी. सच्चाई ये है कि इस संगठन का पूरा बिज़नस मॉडल स्टॉक को क्रैश करके पैसा बनाना था, जिसे आसानी से भुला दिया गया.

हालांकि, जैसे-जैसे समय बीतता गया और ज़्यादा जानकारियां सामने आईं, जनता की राय पलट गई. अब, हमारे पास सेबी के कारण बताओ नोटिस का जवाब देने से इनकार करने की हिंडनबर्ग की बेशर्मी भरी कोशिश है. इसके अलावा, ये संगठन एक और रिपोर्ट लेकर आया है जिसमें सेबी अध्यक्ष, उनके पति और अडानी समूह के बीच 'संबंध' होने का दावा किया गया है.

जिन लोगों ने असल में ये रिपोर्ट पढ़ी है, उनका कहना है कि इसमें कुछ भी नहीं है, और अब तक, ये पूरी तरह से स्पष्ट हो चुका है. हालांकि, असली सवाल ये है कि हिंडनबर्ग ने ऐसे आरोप जो जांच के दायरे में नहीं आएंगे, उन्हें लगाकर क्या हासिल करने की उम्मीद की थी? इसका जवाब दोहरा है.

सबसे पहले तो ये 'हमला ही सबसे अच्छा बचाव है' वाला क़दम है. एक बार जब ये रेग्युलेटर के ख़िलाफ़ आरोप लगा देता है, तो ये रेग्युलेटर द्वारा की गई किसी भी जांच और कार्रवाई को पक्षपात भरा बताकर ख़ारिज कर सकता है. इसने कारण बताओ नोटिस को 'बकवास' बताकर ख़ारिज कर दिया और जवाब देने से इनकार कर दिया है. उसकी इस बहादुरी का एक पहलू उसके नस्लवादी और/या औपनिवेशिक रवैये में निहित है. चूंकि हिंडनबर्ग एक पश्चिमी संस्था है, इसलिए भारत जैसे ग़ैर-पश्चिमी देश में रेग्युलेटर ने इस पर सवाल उठाने की हिम्मत कैसे की? हमने पूरे कोविड-19 वैक्सीन प्रकरण के दौरान इस तरह की बहुत सी बकवास देखी हैं.

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दूसरे, ये एजेंडा राजनीतिक और मीडिया प्रतिष्ठानों के एक हिस्से द्वारा आसानी से स्वीकार किया जाता है और आगे बढ़ाया जाता है. जिस गति से हिंडनबर्ग के आरोपों को सही माना गया और फिर दोहराया और बढ़ाया गया, उससे ये स्पष्ट हो गया कि ये एक संगठित और समन्वित प्रयास था. इसका मक़सद था, हिंडनबर्ग के ख़ुद के बचाव को मज़बूत करना और उम्मीद ये थी कि बाज़ार डूब जाएगा और इससे रेग्युलेटर की प्रतिष्ठा को गंभीर नुक़सान पहुंचेगा. बेशक़, मार्केट को शॉर्ट करने की कोशिश करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए भी ये फ़ायदे की बात थी. जो हमें देखने को मिला, वो ये था कि संकेत मिलते ही राजनेताओं और मीडिया का एक वर्ग हिंडनबर्ग के समर्थन में एक साथ खड़ा दिखा.

कोई भी शख़्स जो इस नाटक को देख रहा है, उसे समझना चाहिए कि हम भारत में राजनीतिक विमर्श के काफ़ी हद तक ख़तरनाक हो चले चरण में प्रवेश कर चुके हैं. स्पष्ट दिखाई देता है कि हमारे पास एक शक्तिशाली घरेलू राजनीतिक विचारधारा है जो अब देश और इसकी अर्थव्यवस्था को संस्थागत तरीक़े से चोट पहुंचाने को राजनीतिक लड़ाई जीतने जैसा समझती है.

हिंडनबर्ग की गाथा ग्लोबल फ़ाइनांस, राजनीतिक हितों और राष्ट्रीय संस्थानों के अंतर्संबंधों की जटिलता को उजागर करती है. जहां शॉर्ट-सेलिंग और इन्वेस्टिगेटिव फ़ाइनेंशियल रिसर्च का बाज़ार की अखंडता बनाए रखने में अपना रोल होता है, वहीं ये मामला ग़लत इरादे और हेरफेर की संभावना को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है. आने वाले समय में हम इसी तरह के और भी एपिसोड देखेंगे और निवेशकों और आम जनता के लिए ये बहुत ज़रूरी है कि वे इन सभी को लेकर जागरूक रहें और हर क़दम पर सभी स्रोतों से मिली जानकारी का पूरी गंभीरता से आकलन करें.

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