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जब नियम लागू नहीं होते

कभी-कभी असाधारण हालात सचमुच निवेश के नियम तोड़ने की वजह देते हैं. या क्या वाक़ई ऐसा है?

कभी-कभी असाधारण हालात सचमुच निवेश के नियम तोड़ने की वजह देते हैं. या क्या वाक़ई ऐसा है?Aditya Roy/AI-Generated Image

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सारांशः निवेश का हर नियम हर हालात में लागू नहीं होता. अगर आपकी आमदनी मज़बूत है और ख़र्चे पोर्टफ़ोलियो पर निर्भर नहीं, तो ज़्यादा इक्विटी रखना समझदारी हो सकती है. लेकिन असली चुनौती बाज़ार की गिरावट में धीरज बनाए रखने की है. नियम तोड़िए, मगर प्लानिंग के साथ-वरना पछताना पड़ सकता है.

एक 66 साल पाठक ने एक सीधा सवाल पूछा: जब उनकी पेंशन और किराए की आमदनी हर ज़रूरत पूरी कर देती है-साल में दो छुट्टियों समेत-तो फिर कोई डेट (debt) क्यों रखें? उनके सारे निवेश इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स और डायरेक्ट इक्विटी में हैं और उन्हें इसमें बदलाव की ज़रूरत नज़र नहीं आती.

उनका मामला असामान्य भी है और अहम भी. उनके पास अपना घर है, कंपनी से मिला हेल्थ इंश्योरेंस है, कमर्शियल प्रॉपर्टी से नियमित किराया आता है और पेंशन भी मिलती है. उनके बच्चे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं. उनकी आमदनी और ख़र्च के बीच इतना बड़ा अंतर है कि उनका पोर्टफ़ोलियो सचमुच एक्स्ट्रा पैसा है, जिसकी उन्हें शायद कभी ज़रूरत ही न पड़े.

यही असली प्वाइंट है. ज़्यादातर नियम इसलिए बने हैं क्योंकि उनके पीछे कुछ मान्यताएं होती हैं. सामान्य एसेट एलोकेशन की सलाह मानती है कि आपको जीने के ख़र्च निकालने के लिए निवेश से पैसा निकालना पड़ सकता है, कि ‘सीक्वेंस-ऑफ़-रिटर्न्स’ का रिस्क मायने रखता है, और कि अस्थिरता का टकराव हर महीने के बिलों से होगा. अगर ये मान्यताएं लागू नहीं होतीं, तो नियमों को मोड़ा जा सकता है.

आम गाइडलाइन कहती है कि हर किसी को डेट में कुछ न कुछ निवेश ज़रूर रखना चाहिए. एक डेट बकेट इ्क्विटी में आने वाले उतार-चढ़ाव के झटकों को सोखता है, पोर्टफ़ोलियो के उतार-चढ़ाव को कम करता है और गिरावट के बाद मजबूरी में निवेश बेचने से बचाता है. लेकिन हमारे पाठकों का कैश फ़्लो उनके पोर्टफ़ोलियो पर निर्भर नहीं करता. सैद्धांतिक रूप से वो सालों तक मार्केट के दामों को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं. मान लें कि आप एक युवा निवेशक हों, जिसके पास लंबा समय है तो ऐसे मामलों में, हाई इक्विटी एलोकेशन जायज़ है.

फिर भी, कुछ सावधानियां अहम हैं.

पहला, स्थाई होना दुर्लभ है. किराए पर दिए जाने वाले मकान ख़ाली रह सकते हैं, किराएदार किराया देने से चूक सकते हैं, किसी बड़ी रिपेयर का ख़र्च अचानक सामने आ सकता है, इंश्योरेसं कंपनियां नियम बदल सकती हैं और परिवार पर स्वास्थ्य का संकट भी आ सकता है. जिन घटनाओं के होने की संभावना कम होती है वो दिखाई नहीं देतीं-जब तक कि घटना घट न जाए.

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दूसरा, व्यवहार सिद्धांत पर भारी पड़ता है. कहना आसान है कि “मैं अपने पोर्टफ़ोलियो को नहीं छुऊंगा.” लेकिन 40–50% गिरावट के बीच बैठकर देखना बहुत मुश्किल होता है. 2008–09 या 2020 में कई लोगों ने, जिन्हें “पैसे की ज़रूरत नहीं थी”, फिर भी बेच दिया. अगर आपने कभी इस तरह की गिरावट असल पैसे के साथ झेली नहीं है, तो ये मत मानिए कि आप प्रभावित नहीं होंगे.

थोड़ा निवेश डेट में रखना सिर्फ़ रक्षात्मक ही नहीं होता, बल्कि इसका एक सकारात्मक पहलू भी है. 10–20% शॉर्ट-ड्यूरेशन या लिक्विड निवेशों में रखें, जिन्हें ड्राई पाउडर की तरह इस्तेमाल कर सकें. बड़ी तेज़ी के बाद इक्विटी बेचें और गहरी गिरावट के बाद इक्विटी ख़रीदें. ये कोई भविष्यवाणी नहीं; एक नियम के तहत उतार-चढ़ाव का फ़ायदा उठाने का तरीक़ा है. समय के साथ, ये रिटर्न बढ़ा सकता है और उससे भी ज़्यादा अहम-ये आपको मुश्किल दिनों में काम आने वाली रणनीति देता है.

व्यावहारिक पक्ष भी मायने रखते हैं. डेट बकेट झंझट कम करता है: ये बिना इक्विटी को बेचे अचानक ख़र्चों को पूरा करता है, अचानक मिले धन को संभालकर रखता है और गिफ़्ट या विरासत को सरल बनाता है. लिक्विडिटी (liquidity) अपने आप में एक रिटर्न है.

तो फिर ऐसे हालात में किसी को क्या करना चाहिए?

सबसे पहले एक रिस्क का एक साफ़ मैप बनाइए. अपनी आमदनी के स्रोत लिखिए और ये भी कि कहां-कहां सिंगल पॉइंट ऑफ़ फ़ेल्योर है: बड़ा किराएदार चला जाए, मकान की कोई मरम्मत की ज़रूरत बन जाए, इंश्योरेंस की अनजान शर्त जो आपके निकल आए, या पारिवारिक ज़िम्मेदारी आ जाए.

एक “दो-बुरी-चीज़ों” की प्रैक्टिस कीजिए. मान लीजिए मार्केट गिरता है और साथ ही मकान खाली हो जाता है (या मेडिकल झटका आता है). क्या आप तब भी चैन से सो पाएंगे? अगर हां, तो हाई इक्विटी एलोकेशन ठीक है. अगर नहीं, तो अभी थोड़ा-सा आधार बना लीजिए—उससे पहले कि ज़रूरत पड़ जाए.

अपने व्यवहार को पहले से तय कीजिए. शांत दिन में एक पन्ने की इन्वेस्टमेंट पॉलिसी लिख डालिए, भावी चिंताओं को ध्यान में रखकर. उसमें अपना तय किया हुआ एलोकेशन लिखिए, रीबैलेंसिंग बैंड सेट कीजिए (जैसे इक्विटी ±10 प्रतिशत अंक), और एक संकट का नियम डालिए: “30 दिन तक कोई कार्रवाई नहीं करनी.” ये आपको तब बचाएगा जब अख़बार की सुर्खियां डराने लगेंगी.

काग़ज़ी तैयारियां भी पूरी कीजिए. नॉमिनेशन अपडेट कीजिए; वसीयत और मेडिकल निर्देश दुरुस्त कीजिए; पासवर्ड और स्टेटमेंट्स व्यवस्थित रखिए; किसी भरोसेमंद व्यक्ति को जानकारी दीजिए जो आपके न होने पर अमल कर सके. प्रशासनिक तैयारी रिस्क मैनेजमेंट का मूल हिस्सा है.

उनके बेटे के बारे में भी कुछ शब्द. उन्होंने पिछले 15 सालों में इक्विटी निवेश से पोर्टफ़ोलियो को हर तीन साल में दोगुना होते देखा है. अच्छा अनुशासन और अनुकूल समय से ऐसा संभव है. लेकिन जितना हम मानते हैं, करियर और मार्केट आपस में उससे कहीं ज़्यादा जुड़े होते हैं. नौकरियों में छंटनी अक्सर मंदी में होती है. कामकाजी लोगों के लिए थोड़ा-सा निवेश डेट में रखना रिटर्न को ख़ूब बढ़ाने से ज़्यादा एक विकल्प होने की बात है. ये जीवन में भूमिका बदलने, रिटायर होने या स्टार्टअप शुरू करने की आज़ादी है, जिसमें ऐसी मजबूरी नहीं रह जाती कि अपने इक्विटी निवेश को सबसे निचले स्तर पर बेचना पड़े.

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इनमें से कुछ भी नियम तोड़ने के ख़िलाफ़ नहीं है. ये सिर्फ़ ये कहता है कि नियम सोच-समझ कर तोड़े जाएं. अगर आपकी आमदनी मज़बूत है, देनदारियां कम हैं, काग़ज़ात व्यवस्थित हैं और स्वभाव परखा हुआ है, तो आपने ज़्यादातर इक्विटी रखने का अधिकार कमा लिया है. बस ये पहचानिए कि आप शॉर्ट-टर्म का आराम छोड़कर लॉन्ग-टर्म की ग्रोथ चुन रहे हैं-और सबसे बुरे दिन उस असुविधा को ढोना ही होगा.

बाक़ी सभी के लिए, वही पुराना नियम इसलिए कायम है क्योंकि डेट आपके जीवन को मार्केट की मनमानी से बचाता है. ये आपको समय ख़रीदकर देता है-और समय ही कंपाउंडिंग का ठिकाना है.

इस सबमें बड़ी सीख सीधी है. नियम सहारा होते हैं. वे हमें स्थिर रखते हैं जब तक हम ढांचा खड़ा कर रहे हों. एक बार जब कैश फ़्लो, सुरक्षा और स्वभाव सचमुच आत्मनिर्भर हो जाएं, तब कुछ सहारे हटाए जा सकते हैं. लेकिन मन अच्छे समय और बुरे समय में अलग तरह से काम करता है. अगर आप नियम तोड़ना चाहते हैं, तो इसे प्लानिंग के साथ तोड़ें, अंदाज़े के आधार पर नहीं. आज तय कीजिए कि कल की मुश्किल में आप कैसे व्यवहार करेंगे. तभी अपवाद समझदारी बने रहेंगे-न कि बाद में सुर्खियों में आने वाले पछतावे.

जब नियम मुड़ते हैं

  • नियम शर्तों पर टिके हैं. अगर पेंशन, किराया और इंश्योरेंस जीवन को आराम से कवर करते हैं, तो ऊंचा इक्विटी झुकाव तर्कसंगत हो सकता है.
  • कमज़ोर कड़ियां परखें. खालीपन, मरम्मत या पॉलिसी बदलाव चोट कर सकते हैं; दो-बुरी-चीज़ें अभ्यास ज़रूर करें.
  • व्यवहार ही असली रुकावट है. उतनी ही इक्विटी रखें जितनी आप 40–50% गिरावट में सहन कर सकें.
  • डेट को एक औज़ार मानें. 10–20% लिक्विड हिस्सा रीबैलेंसिंग और अप्रत्याशित स्थितियों में मदद करता है ताकि आपको सबसे बुरे समय में इक्विटी बेचनी न पड़े.

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