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आज ही बनाएं अपनी वसीयत

संजय कपूर की 30,000 करोड़ की संपत्ति पर छिड़ा विवाद बताता है कि सही वसीयत बनाना क्यों ज़रूरी है - और भारत को ब्लॉकचेन प्रमाणीकरण की क्यों ज़रूरत है

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उद्योगपति संजय कपूर की ₹30,000 करोड़ की संपत्ति को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में जारी अनुचित तमाशा हर उस भारतीय के लिए एक चेतावनी की तरह होना चाहिए जिसके पास सुरक्षित करने लायक संपत्ति है. वो एक बेहद अमीर कारोबारी हैं, जिसके पास शायद सबसे अच्छी कानूनी सलाह मौजूद होगी, फिर भी उसका परिवार पूर्व पत्नी करिश्मा कपूर के बच्चों द्वारा किए गए फर्जी वसीयत के दावे पर जटिल कानूनी लड़ाई में उलझा हुआ है. बॉलीवुड कनेक्शन के चलते ये मामला अखबारों की सुर्खियां बना हुआ है, लेकिन असल मुद्दा लाखों भारतीय परिवारों को प्रभावित करता है जो मानते हैं कि उनकी संपत्ति अपने आप ही उनके इच्छित उत्तराधिकारियों के पास चली जाएगी.

कड़वी हक़ीक़त ये है कि बिना सही वसीयत - या विवादित वसीयत के साथ - के मरना किसी मार्केट क्रैश से ज्यादा संपत्ति नष्ट कर सकता है. कानूनी लड़ाइयों में पैसा और समय दोनों लगता है. कानूनी लड़ाइयां अक्सर सालों तक चलती रहती हैं, जबकि संपत्ति फ़्रीज रहती है. जिस परिवार को शोक मनाना चाहिए, वह अदालतों में एक-दूसरे से लड़ता है और वकील ही एकमात्र गारंटीड विजेता होते हैं.

फिर भी इन स्पष्ट जोखिमों के बावजूद, भारतीयों में वसीयत बनाना आश्चर्यजनक रूप से असामान्य है. कुछ सर्वे बताते हैं कि 20 प्रतिशत से भी कम वयस्कों ने वसीयत बनाई है, यहां तक कि पर्याप्त संपत्ति वाले लोगों के मामले में भी ऐसा है. मेरे व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर, ये आंकड़ा भी ज़्यादा लगता है. इसके कारणों में मौत पर चर्चा करने के अंधविश्वास से लेकर साधारण टालमटोल तक शामिल हैं, लेकिन परिणाम हमेशा एक जैसे होते हैं: परिवार के जीवित सदस्यों के लिए गैर ज़रूरी कष्ट.

मैं जो बहाना सबसे ज़्यादा सुनता हूं वो ये है कि भारतीय उत्तराधिकार कानून स्वतः ही निकट परिवार के सदस्यों का पक्ष लेते हैं, जिससे वसीयत गैर ज़रूरी हो जाती है. इससे उत्तराधिकार के काम करने के वास्तविक तरीक़े के बारे में एक खतरनाक ग़लतफ़हमी का पता चलता है. बिना वसीयत के, आपकी संपत्ति जटिल कानूनी फ़ॉर्मूले के अनुसार बांटी जाती है जिसमें आपकी इच्छाओं की झलक नहीं दिख सकती. समाधान आसान है: वसीयत बनाएं. अगले साल नहीं, रिटायरमेंट के बाद नहीं, बल्कि अभी ऐसा करें. एक सामान्य वसीयत कुछ हजार रुपये में बन जाती है और सही कानूनी मार्गदर्शन से घंटों में पूरी हो सकती है. ज़्यादातर लोगों के लिए, दस्तावेज जटिल नहीं होते- बस ये बताना होगा कि क्या किसे मिलना चाहिए और कार्यकारी या वसीयत प्रबंधक (executor) नियुक्त करना पर्याप्त है. ज़्यादातर लोगों के काम आने वाली साधारण वसीयतों के  ऑनलाइन विकल्प सस्ते, तेज़ और काफ़ी अच्छे हैं.

हालांकि, कपूर का मामला एक गहरी व्यवस्थागत समस्या -वसीयतों को प्रमाणित और संरक्षित करने की हमारी पुरानी प्रणाली- को उजागर करता है. वर्तमान में, वसीयतों को मानसिक क्षमता से लेकर सीधे जालसाजी तक के आधार पर चुनौती दी जा सकती है, जो ठीक वैसे ही विवादों को जन्म देती है जैसे हम देख रहे हैं. प्रमाणिकता साबित करने का बोझ अक्सर शोकग्रस्त परिवारों पर पड़ता है जो मृतक के विस्तृत फ़ाइनेंशियल रिकॉर्ड की कमी महसूस कर सकते हैं.

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यही वो क्षेत्र है जहां तकनीक भारत में संपत्ति योजना (एस्टेट प्लानिंग) को बदल सकती है. ब्लॉकचेन-आधारित वसीयत पंजीकरण प्रणाली छेड़छाड़ से सुरक्षित दस्तावेज़ीकरण प्रदान कर सकती है जिसमें स्पष्ट टाइमस्टैंप और डिजिटल हस्ताक्षर हों. ऐसी प्रणालियां अन्य देशों में पहले से मौजूद हैं और हमारी मौजूदा कागजी प्रक्रिया की तुलना में आकर्षक फ़ायदे प्रदान करती हैं.

ब्लॉकचेन-पंजीकृत वसीयत से दस्तावेज़ तैयार करने, संशोधन और अंतिम संस्करण का एक अपरिवर्तनीय रिकॉर्ड तैयार होगा. यह तकनीक वसीयतकर्ता की पहचान की पुष्टि कर सकती है, मानसिक स्थिति के बारे में वीडियो गवाही रिकॉर्ड कर सकती है और इसके अलावा, बदलावों की अनुमति देने से पहले कई रूपों में प्रमाणीकरण की ज़रूरत हो सकती है. सबसे अहम बात, ये दस्तावेज़ की प्रमाणिकता पर सवालों को समाप्त कर देगी जिससे महंगी कानूनी लड़ाइयों को ईंधन मिलता है.

मैं लंबे समय से क्रिप्टोकरेंसी पर संदेह रखता रहा हूं, उन्हें ज़्यादातर सट्टेबाजी के बुलबुले के रूप में देखता हूं जो वास्तविक आर्थिक मूल्य से अलग हैं. हालांकि, इससे जुड़ी ब्लॉकचेन तकनीक वास्तव में समाज को लाभ पहुंचा सकती है - वसीयत प्रमाणीकरण इसका प्रमुख उदाहरण है. भले ही, क्रिप्टो के प्रति उत्साही भ्रामक मुनाफ़ों का पीछा करते हैं, लेकिन असल क्रांति इस तकनीक का उपयोग करके वास्तविक समस्याओं को हल करने में है, जिसमें एस्टेट प्लानिंग की अक्षमताएं शामिल हैं.

सरकार को एक राष्ट्रीय ब्लॉकचेन-आधारित वसीयत रजिस्ट्री लागू करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. ऐसी प्रणाली आधार जैसे मौजूदा पहचान के सत्यापन के तंत्रों के साथ एकीकृत हो सकती है, नागरिकों के लिए अपनी वसीयत को सुरक्षित रूप से पंजीकृत और अपडेट करने की एक सहज प्रक्रिया तैयार कर सकती है. तकनीक मौजूद है; ज़रूरत राजनीतिक इच्छाशक्ति की है जो हमारी कानूनी इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाए.

बहरहाल, अभी तकनीकी समाधानों का इंतजार न करें. मौजूदा प्रणालियों का उपयोग करके अपनी वसीयत बनाएं, चाहे वे कितनी भी अधूरी हों. कपूर परिवार का कोर्टरूम ड्रामा आखिरकार सुलझ जाएगा, लेकिन हम सबके लिए सबक़ स्पष्ट है: सही एस्टेट प्लानिंग सिर्फ़ संपत्ति बांटने के बारे में नहीं है, ये आपके परिवार को ऐसे दौर में गैर ज़रूरी संघर्ष से बचाने के लिए है, जब वो इसका सामना करने की स्थिति में नहीं होते.

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