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अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन सोवियत संघ की ज़िंदगी पर एक मज़ाक सुनाया करते थे, जहां लगातार सामान की कमी रहती थी और लोगों को बुनियादी चीज़ों के लिए भी बेहद लंबा इंतज़ार करना पड़ता था. इस स्टोरी में एक शख़्स सालों की मेहनत के बाद कार ख़रीदने के लिए पैसे जोड़ता है. वो पूरा सरकारी महकमे के चक्कर काटकर, पैसे जमा करता है और क्लर्क उसे कहता है कि ठीक 10 साल बाद आकर कार ले जाना.
वह पूछता है - "सुबह आऊं या दोपहर?"
क्लर्क हैरान हो जाता है - "10 साल बाद - इससे क्या फ़र्क पड़ता है?"
वो जवाब देता है – "दरअसल उस सुबह तो प्लंबर आने वाला है."
ये मज़ाक उस सच्चाई को बताता है जो अनिश्चित सिस्टम में जी रहे लोगों की हालत बताता है. भले ही इंतज़ार 10 साल का हो, लोगों को फिर भी उसी हिसाब से अपनी ज़िंदगी की योजना बनानी पड़ती है. रिश्ते-नाते, ज़रूरी काम, आगे की सोच - सब इसी पर टिका होता है. असल समस्या 10 साल का इंतज़ार नहीं है, बल्कि उस इंतज़ार के बीच तर्कसंगत प्लानिंग न कर पाना है, जो पूरी व्यवस्था को खोखला कर देता है.
आज ये सोवियत काल का मज़ाक बहुत प्रासंगिक लगता है, क्योंकि अमेरिकी नीतियां दुनिया भर में ऐसी ही प्लानिंग पैरालिसिस यानि योजना बनाने में अपंगता (planning paralysis) पैदा कर रही हैं. हाल ही में घोषणा की गई कि अब H-1B वीज़ा आवेदन पर कंपनियों को $1,00,000 खर्च करना होगा - जो पहले की फ़ीस से लगभग 2000% ज़्यादा है. ऐसे अचानक नियम बदलना ही लोगों और बिज़नसेज को असंभव योजनाओं में फंसा देता है.
ज़रा सोचिए, विदेश में काम कर रहे एक भारतीय टेक प्रोफ़ेशनल की हालत क्या होगी. क्या उन्हें नए नियम लागू होने से पहले अमेरिका लौट जाना चाहिए? या फिर कुछ साल रुकना चाहिए? फिर पत्नी का करियर, बच्चों की पढ़ाई और माता-पिता की सेहत जैसी बातें मन में आती हैं? ये सिर्फ़ नीतियों के सवाल नहीं हैं, बल्कि करोड़ों परिवारों की निजी ज़िंदगी से जुड़े अहम फ़ैसले हैं, जो अब अनिश्चित नियमों और बड़ी पारिवारिक ज़रूरतों के बीच फंसे हुए हैं.
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यही प्लानिंग पैरालिसिस कंपनियों को भी परेशान कर रही है, जो अमेरिका की बार-बार बदलती ट्रेड पॉलिसी से जूझ रही हैं. हाल के महीनों में टैरिफ़ की घोषणाएं हुईं, फिर टलीं, बदलीं और कभी-कभी रद्द भी हो गईं. कंपनियों से उम्मीद की जाती है कि वे बड़े निवेश फ़ैसले लें - जैसे फ़ैक्ट्री लगाना, सप्लायर से कॉन्ट्रैक्ट करना, या कर्मचारियों को भर्ती करना – जबकि उन्हें पता ही नहीं होता कि अगले तिमाही में नियम क्या होंगे. सिंगापुर के ट्रेड मिनिस्टर ने मज़ाक में कहा कि वहां से सैन फ़्रांसिस्को तक जहाज़ पहुंचने में जितना समय लगता है, उतनी बार कस्टम ड्यूटी बदल चुकी होती है.
जब किसी कंपनी को नहीं पता कि उसकी सप्लाई चेन पर 10% या 50% शुल्क लगेगा, तो वो कैसे तय करे कि अगली फ़ैक्ट्री कहां लगानी है या किस सप्लायर से कॉन्ट्रैक्ट करना है. ध्यान रहे कि इसका असली महंगा नतीजा सबसे ऊंचा टैरिफ़ नहीं है, बल्कि ये किसी भी सुसंगत ढांचे के आसपास योजना बनाने में असमर्थता है.
भारतीय निवेशकों के लिए इसमें सीख सिर्फ़ अमेरिकी इमिग्रेशन और ट्रेड पॉलिसी तक सीमित नहीं है. यही सिद्धांत हर उस निवेश परिदृश्य पर लागू होता है जहां नियम अचानक बदल जाते हैं. सबसे छिपा हुआ असर ये है कि ये अनिश्चितता व्यवहार को हमेशा के लिए बदल देती है. नियम बदलने से जूझने वाली कंपनियां अब अपनी योजनाओं में बड़े सुरक्षा मार्जिन जोड़ती हैं. वे निवेश टालती हैं, विविध सप्लायर्स पर जोर देती है और ग्रोथ को लेकर ज़्यादा सतर्क हो जाती हैं. वीज़ा से जुड़ी अनिश्चितता झेल रहे लोग केवल यात्रा योजनाएं नहीं टालते - बल्कि करियर पथ, बच्चों की पढ़ाई और पारिवारिक फ़ैसलों पर भी नए सिरे से सोचते हैं.
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ये व्यवहारिक बदलाव नीतियों के स्थिर होने के बाद भी बने रहते हैं. जो कंपनियां सालों तक अनिश्चित व्यापार नियमों से जूझती रहीं, वे अचानक बेहतर माहौल आने पर भी आक्रामक रूप से विस्तार शुरू नहीं करतीं. जिन परिवारों ने वीज़ा की अनिश्चितता झेली, वे जल्दी नहीं भूलते कि कब लौट पाएंगे या रिश्तेदारों को बुला पाएंगे या नहीं. अनिश्चितता का मनोवैज्ञानिक असर अपनी अलग आर्थिक रुकावट पैदा करता है, जो किसी भी नीति की सीधी लागत से कहीं आगे तक असर डालता है.
जब लोग तर्कसंगत प्लानिंग नहीं कर पाते, तो वे सतर्क प्लानिंग करते हैं. और जब सभी लोग एक साथ सतर्क हो जाते हैं, तो निवेशक और पूरी अर्थव्यवस्था सोवियत कार फ़ैक्ट्रियों की तरह हो जाती है - धीमी, सतर्क और क्षमता से कहीं कम असरदार. ऐसा माहौल बन जाता है जहां इक्विटी निवेशक फ़िक्स्ड इनकम चुनने लगते हैं और कंपनियां आक्रामक विस्तार के बजाय कैश बचाने लगती हैं. एक तय उम्र के ऊपर सभी भारतीयों ने इसे अपनी आंखों से देखा है.
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टैरिफ़ और नीतिगत बदलाव हर जगह कंपनियों के लिए बड़े जोखिम लाते हैं. लेकिन कुछ बेहतरीन कंपनियां सिर्फ़ बचेंगी ही नहीं - बल्कि फलेंगी-फूलेंगी. ये वही कंपनियां होती हैं जिनमें नीतियों के बदलाव के साथ ढलने की अनोखी क्षमता होती है.
लेकिन इन्हें पहचानना आसान नहीं है. इसके लिए ज़रूरी है कि आप गहराई से समझें कि कोई बिज़नेस कैसे चलता है. यही समझ आपको हमारी किताब Money, Markets, and Mistakes देती है. धीरेंद्र कुमार के दशकों के अनुभव पर आधारित ये किताब आपको वो दृष्टिकोण देती है जिससे आप ऐसे विनर्स को पहचान सकें और लंबे समय तक साथ बनाए रखें.
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