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बफ़े की विदाई और सेंसेक्स का इतिहास एक जैसी गहरी सीख देते हैं

बफ़े के शब्दों को सेंसेक्स चार्ट के साथ रखिए, एक पैटर्न उभर कर आता है

बफ़े के शब्दों को सेंसेक्स चार्ट के साथ रखिए, एक पैटर्न उभर कर आता हैAditya Roy/AI-Generated Image

अगर आपका मुख्य निवेश 50 फ़ीसदी गिर जाए तो क्या करेंगे?

हममें से ज़्यादातर लोग बाज़ार में 10 प्रतिशत की गिरावट को लेकर घबरा जाते हैं. दिग्गज निवेशक वॉरेन बफ़े ने बर्कशायर हैथवे, जिसे वो दशकों से चला रहे हैं, में कई बार 50 फ़ीसदी की गिरावट झेली है. अपने फ़ाइनल एनुअल लेटर में उन्होंने इन गिरावटों का ज़िक्र बहुत सहज अंदाज़ में किया है.

वैल्यू रिसर्च में हम अक्सर देखते हैं कि जब इंडेक्स थोड़ा भी लड़खड़ाता है तो निवेशकों की प्रतिक्रिया बिल्कुल उलटी होती है. एक मामूली गिरावट भी संकट जैसी लगती है और लोग मुनाफ़ा बुक करने लगते हैं.

बफ़े का शांत मिज़ाज और भारतीय बाज़ार के इतिहास, ख़ासकर 1979 से सेंसेक्स का लगभग 800 गुना बढ़ना, को एक साथ देखें तो उतार-चढ़ाव के साथ जीने के पांच साफ़ संदेश मिलते हैं.

बाज़ार बुरी तरह गिरे, फिर पूरी तरह से रिकवर नज़र आए

इक्विटी निवेश में बड़े झटके आते रहते हैं. बफ़े का ये याद दिलाना कि बर्कशायर ने कई बड़ी गिरावटें देखी हैं, ये कोई नाकामी का संकेत नहीं है. भारतीय बाज़ार भी यही कहता है. घोटालों, ग्लोबल क्राइसिस और महामारी के बीच सेंसेक्स लगभग 100 से बढ़कर 80,000 के पार पहुंच गया है. हर गिरावट उस वक़्त ऐसी डरावनी लगी जैसे सब ख़त्म हो गया हो, लेकिन किसी ने भी लॉन्ग-टर्म दिशा नहीं बदली.

भविष्यवाणी से ज़्यादा स्वभाव मायने रखता है

आमतौर पर नतीजे आपके अनुमान से नहीं बल्कि आपके व्यवहार से तय होते हैं. बफ़े इस बात पर बहुत साफ़ हैं कि भविष्य हमेशा चौंकाता है. वो अगले ट्रिगर का अंदाज़ा लगाने में समय नहीं लगाते. जब भी सेंसेक्स तेज़ी से ऊपर जाता है, तो सवाल लगभग अंदाज़े के बारे में होते हैं. क्या ये टॉप है? क्या ये सिर्फ़ एक गिरावट है? क्या अब सतर्क हो जाना चाहिए?

हममें से ज़्यादातर लोग सिर्फ़ इसलिए पैसे नहीं गंवाते क्योंकि मार्केट गिरता है. हम इसलिए परेशान होते हैं क्योंकि गिरावट के दौरान निवेश बनाए रखना आसान नहीं होता.

सही नायकों को चुनिए

आप किसकी नकल करते हैं, ये आपकी सोच से ज़्यादा मायने रखता है. बफ़े की सलाह साफ़ है कि सही नायकों को चुनिए और उन्हें फ़ॉलो कीजिए. उनके नायक वो हैं जो लॉन्ग-टर्म नज़रिया रखते हैं, समझदारी से काम लेते हैं और शोर से घबराते नहीं हैं. इसके उलट, कई निवेशक उस पड़ोसी को नायक बना लेते हैं जिसने दावा किया कि वो टॉप पर बाहर निकल गया या किसी व्हाट्सऐप ग्रुप में सबसे तेज़ बोलने वाले को.

आपका नसीब पर नियंत्रण नहीं लेकिन अपनी योजना पर तो है

बफ़े अक्सर कहते हैं कि सफ़लता में क़िस्मत की भी भूमिका होती है. ये एक रिमाइंडर है कि ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जो तब भी बचाए जब क़िस्मत साथ न दे. अगर आप घटनाओं को कंट्रोल नहीं कर सकते, तो कंट्रोल करें कि आप उनसे कैसे निपटते हैं.

आपको एक ऐसे स्ट्रक्चर की ज़रूरत है जो ख़राब महीनों में ग़लत प्रतिक्रिया देने से बचाए. ज़्यादातर निवेशकों के लिए इसका मतलब प्लानिंग है, चालाकी नहीं. आप एक ऐसा पोर्टफ़ोलियो बनाएं जिसमें न सिर्फ़ अच्छे महीनों में, बल्कि ख़राब महीनों में भी साथ रहने की क्षमता हो.

अगर किसी निवेशक के पिछले दो दशकों के सबसे ख़राब महीनों के दौरान मार्केट में ₹10 लाख लगे होते, तो वो गिरकर क़रीब ₹7.6 लाख रह सकते थे. लेकिन एक संतुलित पोर्टफ़ोलियो, मान लीजिए एक एग्रेसिव हाइब्रिड फ़ंड के साथ, शायद सिर्फ़ ₹8.2 लाख तक गिरते देखा होगा.

लॉन्ग-टर्म नज़रिया रखें, सुर्खियों से बचें

आख़िर में, अपने टाइम फ्रेम को अगले डर या इलेक्शन साइकिल से आगे बढ़ाएं. अपनी चिट्ठी में बफ़े लिखते हैं कि बर्कशायर को अगले सौ साल में बस कुछ ही CEOs की ज़रूरत होगी.

ज़्यादातर निवेशक छोटे साइकिल में सोचते हैं, अगली गिरावट, अगला पॉलिसी बदलाव या अगली डरावनी हेडलाइन. लेकिन वही लॉन्ग-टर्म सेंसेक्स चार्ट, जो पास से डरावना लगता है, दूर से देखने पर बिल्कुल अलग कहानी बयां करता है.

क़ीमतें गिरेंगी. ख़बरें डराएंगी. बाज़ार हमेशा रिकवर हुआ है और नई ऊंचाइयों पर पहुंचा है. उतार-चढ़ाव उस रिटर्न की क़ीमत है जो महंगाई और फ़िक्स्ड डिपॉज़िट से बेहतर रिटर्न देता है. असल सवाल ये नहीं है कि मार्केट रिकवर होगा या नहीं. सवाल ये है कि क्या निवेशक उस रिकवरी का फ़ायदा उठाने के लिए लंबे समय तक निवेशित रह पाएंगे.

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ये भी पढ़ें: स्टॉक से ज़्यादा मुनाफ़ा पाने के वॉरेन बफ़े के तरीक़े

ये लेख पहली बार नवंबर 21, 2025 को पब्लिश हुआ.

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