फंड वायर

भारत के टॉप स्मॉल-कैप फ़ंड्स के 200-स्टॉक का राज़

आइए जानते हैं कि इतनी बड़ी होल्डिंग्स वाला ये तरीक़ा कैसे काम कर रहा है

आइए जानते हैं कि इतनी बड़ी होल्डिंग्स वाला ये तरीक़ा कैसे काम कर रहा हैAditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः आमतौर पर जब किसी पोर्टफ़ोलियो में बहुत ज़्यादा स्टॉक होते हैं, तो भरोसा कम होता है. कागज़ पर, ऐसा लग सकता है कि फ़ंड अपने भरोसे पर चलने के बजाय बस मार्केट का एक बड़ा हिस्सा ख़रीद रहा है. फिर भी निप्पॉन और बंधन के स्मॉल-कैप फ़ंड ठीक ऐसा ही कर रहे हैं, और नतीजे बिल्कुल भी कमज़ोर नहीं रहे. दोनों में से हर एक के पास 200 से ज़्यादा स्टॉक होने के बावजूद, दोनों फ़ंड्स ने पिछले पांच साल में 30% से ज़्यादा का सलाना रिटर्न दिया है. पहली नज़र में जो साइज़ भारी लगता है, वही असल में फ़ायदे का कारण बन गया है. यहां जानिए कि ये तरीक़ा निवेशकों के लिए इतना बेहतर कैसे काम कर रहा है…

आज एक एवरेज एक्टिव स्मॉल-कैप फ़ंड में 89 स्टॉक होते हैं. असल में, 31 में से 25 स्मॉल-कैप फ़ंड्स के पोर्टफ़ोलियो में 100 से कम स्टॉक होते हैं.

लेकिन औसत को ऊपर खींचने वाले दो फ़ंड हैं, और दिलचस्प बात ये है कि ये पिछले पांच साल के टॉप-परफॉर्मिंग फ़ंड्स में भी शामिल हैं.

दोनों ने पिछले पांच सालों में 30% से ज़्यादा सालाना रिटर्न दिया है, सिर्फ़ क्वांट स्मॉल कैप से पीछे.

पहली नज़र में ये अजीब लगता है. थ्योरी के हिसाब से, आपको लगेगा कि स्मॉल-कैप फ़ंड 50–100 भरोसेमंद स्टॉक्स रखना पसंद करते हैं, क्योंकि ये कंपनियां तेज़ी से ऊपर-नीचे होती हैं. ज़्यादा स्टॉक्स का मतलब कम असरदार होता है.

तो, आखिर इन दोनों फ़ंड्स का पोर्टफ़ोलियो इतना बड़ा क्यों है?

ऐसा इसलिए है क्योंकि दोनों फ़ंड्स में भारी निवेश हुआ है:

  • निप्पॉन का कॉर्पस 2020 से अब तक छह गुना हो गया है.
  • बंधन की कुल एसेट 2020 की ₹800 करोड़ से बढ़कर आज ₹17,300 करोड़ से ज़्यादा हो गई है.

ये आंकड़े इसलिए मायने रखते हैं क्योंकि स्मॉल-कैप स्टॉक कम ट्रेड होते हैं. ये बहुत ज़्यादा वॉल्यूम में ट्रेड नहीं करते हैं. अगर ₹20,000 करोड़ वाला कोई फ़ंड किसी स्मॉल-कैप स्टॉक में ज़्यादा ख़रीदारी कर दे, तो दो समस्या होती हैं:

  1. क़ीमत तुरंत उछल जाती है.
  2. और बाद में बेचने का वक़्त आया तो खरीदार ही नहीं मिलता, क़ीमत गिर सकती है.

यही वजह है कि स्टॉक की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव से बचने और लचीले बने रहने के लिए, निप्पॉन और बंधन जैसे कुछ बड़े स्मॉल-कैप फ़ंड कुछ ही स्टॉक पर बड़ा दांव लगाने के बजाय, अपना पैसा कई स्टॉक में फैला देते हैं.

इसके अलावा, जो स्मॉल-कैप फ़ंड सबसे कम स्टॉक रखते हैं (सबसे कम स्टॉक होल्डिंग), उनमें से पांच सात फ़ंड तीन साल से कम पुराने हैं. यानी छोटे फ़ंड कंसन्ट्रेटेड दांव लगा सकते हैं, क्योंकि उनके पास निवेश करने के लिए कम पैसा होता है; बड़े फ़ंड ऐसा नहीं कर सकते.

अब जब हम समझ गए हैं कि बड़े स्मॉल-कैप फ़ंड क्यों इतने बड़े पोर्टफ़ोलियो रखते हैं, आइए समझते हैं कि निप्पॉन और बंधन इस स्ट्रक्चर का फ़ायदा कैसे उठा रहे हैं.

  1. इनका पोर्टफ़ोलियो बड़ा है, लेकिन ज़्यादा भारी नहीं है

एक आम स्मॉल-कैप फ़ंड अपने पोर्टफ़ोलियो का लगभग 25% हिस्सा टॉप 10 में लगाता है. यानी सिर्फ़ स्टॉक का एक चौथाई हिस्सा तय करता है कि फ़ंड चमकेगा या गिरेगा.

लेकिन ये दो बड़े फ़ंड्स का डिज़ाइन काफ़ी अलग है:

  • निप्पॉन के टॉप 10 शेयरों का कुल पोर्टफ़ोलियो में सिर्फ़ 14 प्रतिशत वेटेज है
  •  बंधन के टॉप 10 शेयरों का वेट सिर्फ़ 18% है

मतलब, कोई एक स्टॉक फ़ंड के रिटर्न पर ज़रूरत से ज़्यादा असर नहीं डालता. मुनाफ़ा कई जगहों से आता है, किसी एक हीरो से नहीं. और उतनी ही ज़रूरी बात ये है कि एक ग़लत स्टॉक पूरा पोर्टफ़ोलियो नहीं बिगाड़ सकता.

ये डिज़ाइन सोच-समझकर बनाया गया है. छोटे-छोटे, बंटे हुए दांवों का एक बड़ा बेस जो इंजन को चालू रखता है, फिर चाहे किसी भी स्टॉक का दिन ख़राब क्यों न चल रहा हो.

2.स्मॉल-कैप में बड़ी संख्या ही ताक़त है

स्मॉल-कैप में, रिटर्न का पैटर्न बहुत अलग-अलग होता है: कुछ ही कंपनियां ज़्यादा मुनाफ़ा देती हैं. चुनौती ये है कि कौन-सी कंपनी आगे चमकेगी, ये पहले से पकड़ना बहुत मुश्किल है. इसीलिए कॉन्संट्रेटेड पोर्टफ़ोलियो मुश्किल में पड़ जाते हैं. अपने दांव कम करके, वो विनर्स में से ज़्यादा को पकड़ने के अपने मौके़ को भी कम देते हैं.

निप्पॉन और बंधन का तरीक़ा अलग है. उनका दायरा ही उनके लिए एक वरदान है. वो अगले एक या दो चैंपियन का अंदाज़ा लगाने के बजाय, हर साल स्मॉल-कैप यूनिवर्स में उभरने वाले दर्जनों छोटे, अप्रत्याशित विनर्स से फ़ायदा उठाने के लिए खुद को तैयार करते हैं. ये फैला हुआ स्ट्रक्चर सेगमेंट की असलियत से मेल खाता है.

ये पक्का करके कि पोर्टफ़ोलियो में किसी एक होल्डिंग का हिस्सा 3-4% से ज़्यादा नहीं है, वो ग़लतियों के असर को भी कम करते हैं.

3.पिछले पांच सालों में कॉन्संट्रेशन (एकाग्रता) नहीं, बल्कि विस्तार को रिवार्ड मिला

कोविड के बाद के सालों में, स्मॉल-कैप ने न सिर्फ़ अच्छा परफ़ॉर्म किया, बल्कि वो तेज़ी से बढ़े और Nifty 50 TRI के मुक़ाबले 40% से ज़्यादा बढ़े. घरेलू इनफ़्लो की कई लहरों ने सिर्फ़ जाने-पहचाने टॉप 50 नामों के बजाय पूरे मार्केट में तेज़ी लाई.

ख़ास बात ये है कि वेल्थ क्रिएशन सिर्फ़ 50 सबसे बड़ी स्मॉल-कैप कंपनियों में ही नहीं, बल्कि पूरे स्मॉल-कैप यूनिवर्स में हुआ. कई कंपनियां जो चर्चा में नहीं थीं, वो चुपचाप मल्टीबैगर बनीं. निप्पॉन और बंधन जैसे फ़ंड, अपने बड़े पोर्टफ़ोलियो के साथ, इन उभरते हुए विनर्स को पकड़ने में स्वाभाविक रूप से बेहतर रहे. उन्हें ज़्यादा मल्टीबैगर को सिर्फ़ इसलिए पकड़ने में कामयाबी मिली, क्योंकि उनका नेट ज़्यादा बड़ा था. उदाहरण के लिए, अकेले बंधन ने कम से कम 17 ऐसे स्टॉक पकड़े जो 24 महीनों में तीन गुना बढ़े.
वहीं, निप्पॉन इंडिया की स्कीम में कम से कम 50 मल्टीबैगर रहे हैं.

4.डाइवर्सिफ़िकेशन के मामले में निप्पॉन और बंधन की बढ़त

असल में, डाइवर्सिफ़िकेशन सिर्फ़ गिरावट में नहीं, बल्कि तेज़ी के दौरान भी दिख सकता है. इसे “अपसाइड कैप्चर” के ज़रिए कैप्चर किया जाता है, जो आपको बताता है कि कोई फ़ंड बढ़ते मार्केट में कितना हिस्सा ले सकता है. पिछले पांच साल में औसत स्मॉल-कैप फ़ंड ने तेज़ी का सिर्फ़ लगभग 78% ही कैप्चर किया. निप्पॉन ने लगभग 90% और बंधन ने लगभग 98% की पूरी बढ़त कैप्चर की.

मतलब, जब पिछले पांच सालों में मार्केट 10% बढ़ा, तो ये फ़ंड 9 से 9.8% चढ़े, जबकि औसत फ़ंड को बराबरी करने में मुश्किल हुई.

इसका जवाब बड़ा सीधा सा है, क्योंकि 200-स्टॉक वाला फ़ंड किसी भी रैली में ज़्यादा विनर्स को पकड़ सकता है. जब मार्केट में तेज़ी आती है, तो कुछ ही नहीं, बल्कि दर्जनों होल्डिंग्स हिस्सा लेना शुरू कर देती हैं.

आखिर में

2020 से 2025 का समय बड़े पोर्टफ़ोलियो के लिए बिल्कुल सही था:

  • सैकड़ों छोटी कंपनियों की री-रेटिंग हुई
  • भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज़ी आई 
  • कैपेक्स और मैन्युफैक्चरिंग में तेज़ी आई
  • घरेलू निवेशकों से लिक्विडिटी आई

इसीलिए निप्पॉन और बंधन एक उलट सच्चाई को बताते हैं: स्मॉल-कैप में डाइवर्सिफ़िकेशन सिर्फ़ सुरक्षा नहीं है, ये परफ़ॉर्मेंस का इंजन भी बन सकता है.

ऐसी और जानकारी के लिए वैल्यू रिसर्च पढ़ते रहें.

ये भी पढ़ेंः 20 साल में तैयार करनी है ₹5 करोड़ की वेल्थ? एक सरल SIP से हो जाएगा ये काम

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

4 इंटरनेशनल फ़ंड फिर खुले, ये रही पूरी लिस्ट

पढ़ने का समय 6 मिनट•आकार रस्तोगी

पैसे की ज़रूरत है? तो समझदारी से बेचिए

पढ़ने का समय 3 मिनट•आशुतोष गुप्ता

दो स्टॉक्स 70% गिरे, फ़ंड्स ने एक को ख़रीदा और दूसरे से किनारा कर लिया

पढ़ने का समय 7 मिनट•अभिषेक राणा

वही 100 स्टॉक, एक फ़ंड ने 53% और चार ने दिया 30% रिटर्न

पढ़ने का समय 6 मिनट•आकार रस्तोगी

तीन साल का इंतज़ार

पढ़ने का समय 4 मिनट•धीरेंद्र कुमार down-arrow-icon

म्यूचुअल फंड पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

तीन साल का इंतज़ार

अभी-अभी पैर जमा रहे फ़ंड्स को परखने का चार-टेस्ट वाला तरीक़ा

अन्य एपिसोड

दूसरी कैटेगरी