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PMS से कमोडिटी तक: SEBI के फ़ैसलों का आप पर क्या होगा असर?

PMS के ज़रिए म्यूचुअल फ़ंड में निवेश का नया रास्ता, कमोडिटी में विदेशी निवेशकों को ज़्यादा छूट और सेटलमेंट के नए नियम-जानिए किस बदलाव से आपका कितना लेना-देना है

PMS के ज़रिए म्यूचुअल फ़ंड में निवेश का नया रास्ता, कमोडिटी में विदेशी निवेशकों को ज़्यादा छूट और सेटलमेंट के नए नियम-जानिए किस बदलाव से आपका कितना लेना-देना हैMukul Ojha/AI-Generated Image

सारांशः SEBI बोर्ड ने PMS, कमोडिटी डेरिवेटिव्स और सेटलमेंट से जुड़े नियमों में कई बदलावों को मंज़ूरी दी है. ₹25 लाख या उससे ज़्यादा निवेश करने वालों के लिए PMS के ज़रिए म्यूचुअल फ़ंड में निवेश का नया रास्ता खुला है, वहीं PMS मैनेजर अब IPO और अनलिस्टेड डेट जैसे विकल्पों में भी पैसा लगा सकेंगे. आम निवेशक के लिए सिर्फ़ इन बदलावों की वजह से पोर्टफ़ोलियो में फेरबदल ज़रूरी नहीं है.

SEBI बोर्ड ने गुरुवार, 24 सितंबर को बाज़ार के कई नियमों में बदलाव को मंज़ूरी दी है. PMS के लिए 2020 के नियमों की जगह नए नियम आएंगे, PMS के ज़रिए म्यूचुअल फ़ंड में निवेश का अलग रास्ता खुला है, विदेशी निवेशकों (FPI) को कमोडिटी डेरिवेटिव्स में ज़्यादा जगह मिली है और सेटलमेंट का तरीक़ा भी बदला गया है.

इनमें से कुछ बदलाव निवेश के नए विकल्प खोलते हैं, तो कुछ का असर बाज़ार पर धीरे-धीरे दिखेगा. ध्यान रहे, ये नियम SEBI के नोटिफ़िकेशन और सर्कुलर के बाद ही लागू होंगे.

एक नज़र में: SEBI के बड़े फ़ैसले

बदलाव क्या बदला आम निवेशक पर असर
PRIM (PMS के ज़रिए MF निवेश) PMS कंपनियां क्लाइंट का पैसा डायरेक्ट प्लान वाली MF स्कीमों, ETF, इंडेक्स फ़ंड और SIF में लगा सकेंगी; न्यूनतम निवेश ₹25 लाख; फ़िक्स्ड फ़ीस अधिकतम 1% ₹25 लाख या ज़्यादा लगाने वालों के लिए नया विकल्प
PMS के निवेश का दायरा IPO और प्राइमरी मार्केट डेट; क्लाइंट की सहमति से 10% तक अनलिस्टेड डेट; AUM के 1.25 गुना तक डेरिवेटिव्स; विदेशी सिक्योरिटीज़ सिर्फ़ PMS निवेशकों पर; रिस्क समझना ज़रूरी
FPI और कमोडिटी डेरिवेटिव्स नॉन-एग्री इंडेक्स डेरिवेटिव्स और फ़िज़िकल सेटलमेंट वाले नॉन-एग्री कॉन्ट्रैक्ट्स में एंट्री; डिलीवरी से पहले पोज़िशन काटनी होगी सीधा असर नहीं; लिक्विडिटी बढ़ सकती है
सेटलमेंट के नियम फ़ॉर्मूला से सेटलमेंट अमाउंट; ₹10 लाख तक के मामलों में फ़ास्ट-ट्रैक; SCN के बाद आवेदन की मियाद 60 से 90 दिन सीधा असर नहीं; मामले जल्दी और साफ़ ढंग से निपटेंगे
स्रोत: SEBI प्रेस रिलीज़ (PR No. 59/2026, 24 सितंबर 2026)

1. ₹25 लाख हैं तो PMS के ज़रिए MF निवेश का नया रास्ता

SEBI ने Portfolio Managers Route for Investing in Mutual Fund Units यानी PRIM को मंज़ूरी दी है. इसके तहत PMS कंपनियां क्लाइंट का पैसा भारतीय AMC की म्यूचुअल फ़ंड स्कीमों के डायरेक्ट प्लान में लगा सकेंगी, जिनमें ETF, इंडेक्स फ़ंड और स्पेशलाइज़्ड इन्वेस्टमेंट फ़ंड्स (SIF) भी शामिल हैं. न्यूनतम निवेश ₹25 लाख होगा, जबकि सामान्य PMS में यह सीमा ₹50 लाख है. सिर्फ़ PRIM चलाने वाली कंपनियां ₹2 करोड़ की नेटवर्थ के साथ अलग रजिस्ट्रेशन ले सकेंगी.

निवेशकों के लिहाज़ से PRIM की कुछ शर्तें अहम हैं:

  • फ़ीस पर लगाम: फ़िक्स्ड मैनेजमेंट फ़ीस AUM के अधिकतम 1% तक होगी. परफ़ॉर्मेंस आधारित फ़ीस का विकल्प भी रहेगा.
  • एग्ज़िट लोड से छूट: PRIM में एग्ज़िट लोड के प्रावधान लागू नहीं होंगे.
  • अपने ग्रुप के फ़ंड्स पर सीमा: अपने ग्रुप या सहयोगी AMC की स्कीमों में क्लाइंट का ज़्यादा से ज़्यादा 25% पैसा लगाया जा सकेगा.
  • डिस्ट्रीब्यूशन और PRIM अलग-अलग: एक्रेडिटेड इन्वेस्टर को छोड़कर बाक़ी क्लाइंट्स के लिए MF डिस्ट्रीब्यूशन और PRIM का काम अलग-अलग रखना होगा.

यानी ₹25 लाख या ज़्यादा के साथ अपना MF पोर्टफ़ोलियो किसी प्रोफ़ेशनल से संभलवाने का एक औपचारिक रास्ता खुल गया है. लेकिन यह सिर्फ़ एक विकल्प है, ज़रूरत नहीं. डायरेक्ट प्लान में आप ख़ुद भी बिना किसी बड़ी न्यूनतम सीमा के निवेश कर सकते हैं. PRIM में फ़ंड के ख़र्च के ऊपर मैनेजर की फ़ीस भी लगेगी. ₹25 लाख पर 1% फ़ीस का मतलब है सालाना ₹25,000 तक. असली सवाल यही है कि क्या मैनेजर की सलाह इस अतिरिक्त फ़ीस के लायक़ है.

2. PMS मैनेजर के पास पैसा लगाने के ज़्यादा रास्ते

PMS के नए नियमों में निवेश का दायरा भी बढ़ाया गया है:

  • IPO और प्राइमरी डेट: पोर्टफ़ोलियो मैनेजर IPO और प्राइमरी मार्केट के डेट इश्यू में निवेश कर सकेंगे.
  • अनलिस्टेड डेट: डिस्क्रिशनरी PMS में क्लाइंट की सहमति से AUM का 10% तक इन्वेस्टमेंट-ग्रेड, नॉन-कन्वर्टिबल अनलिस्टेड डेट में लगाया जा सकेगा.
  • डेरिवेटिव्स: एक्सचेंज पर ट्रेड होने वाले डेरिवेटिव्स में AUM के 1.25 गुना तक निवेश की छूट होगी.
  • विदेशी सिक्योरिटीज़: डिस्क्रिशनरी और नॉन-डिस्क्रिशनरी, दोनों PMS में विदेशी शेयर, डेट, REIT, म्यूचुअल फ़ंड, ETF, इंडेक्स फ़ंड और सरकारी बॉन्ड में निवेश हो सकेगा. यह FEMA और RBI की लिबरलाइज़्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के दायरे में होगा.

साथ ही "इंडिपेंडेंट फ़ंड मैनेजर" (IFM) की नई कैटेगरी आई है, जो किसी रजिस्टर्ड PMS कंपनी की ज़िम्मेदारी में क्लाइंट का पोर्टफ़ोलियो संभालेंगे.

लेकिन ज़्यादा विकल्प का मतलब कम रिस्क नहीं है. अनलिस्टेड डेट को ज़रूरत पड़ने पर बेचना आसान नहीं होता, डेरिवेटिव्स में उतार-चढ़ाव ज़्यादा होता है और विदेशी निवेश में करेंसी का रिस्क भी जुड़ जाता है. इसलिए सहमति देने से पहले समझें कि आपका मैनेजर कहां पैसा लगाएगा.

3. विदेशी निवेशक कमोडिटी बाज़ार में ज़्यादा सक्रिय हो सकेंगे

SEBI ने FPI के लिए नॉन-एग्री यानी ग़ैर-कृषि कमोडिटी डेरिवेटिव्स का दायरा बढ़ाया है. अब वे नॉन-एग्री इंडेक्स डेरिवेटिव्स में हिस्सा ले सकेंगे, चाहे इंडेक्स का अंडरलाइंग कैश-सेटल्ड हो या नहीं. साथ ही, वे फ़िज़िकल डिलीवरी वाले नॉन-एग्री कॉन्ट्रैक्ट्स में भी ट्रेड कर सकेंगे.

शर्त यह है कि FPI को डिलीवरी की ज़िम्मेदारी बनने से पहले पोज़िशन काटनी होगी, यानी एक्सपायरी से तीन दिन पहले शुरू होने वाले टेंडर पीरियड से पहले. इन तीन दिनों में वे पोज़िशन बढ़ा भी नहीं सकेंगे.

आपके म्यूचुअल फ़ंड या शेयर पर इसका सीधा असर नहीं पड़ेगा. हां, विदेशी निवेशकों के आने से कमोडिटी बाज़ार में लिक्विडिटी और प्राइस डिस्कवरी बेहतर हो सकती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सोने-चांदी की कीमतें किसी एक दिशा में जाएंगी.

यह भी पढ़ेंः SIF क्या है और क्या इसे पोर्टफ़ोलियो में जगह देनी चाहिए?

4. सेटलमेंट के नए नियमों से क्या फ़ायदा?

SEBI ने 2018 के सेटलमेंट नियमों की जगह नए नियमों को मंज़ूरी दी है, जो नोटिफ़िकेशन के 30 दिन बाद लागू होंगे. अब सेटलमेंट अमाउंट एक तय फ़ॉर्मूले से निकलेगा. ग़लत तरीक़े से कमाया गया मुनाफ़ा अलग से वसूला (डिसगॉर्ज) जाएगा.

कुछ और अहम बदलाव:

  • सेटलमेंट नोटिस: शो-कॉज़ नोटिस (SCN) से पहले SEBI सेटलमेंट नोटिस भेजकर आवेदन के लिए 60 दिन देगा.
  • ज़्यादा समय: SCN मिलने के बाद आवेदन की मियाद 60 से बढ़कर 90 दिन होगी.
  • फ़ास्ट-ट्रैक: ₹10 लाख तक के सेटलमेंट अमाउंट वाले और डिस्क्लोज़र जैसे उल्लंघनों के मामलों के लिए फ़ास्ट-ट्रैक रास्ता होगा.
  • नए तरह के मामले: वित्तीय नतीजों में ग़लत जानकारी और फ़ंड डायवर्ज़न के मामलों में भी सेटलमेंट हो सकेगा, बशर्ते डायवर्ट किया गया पैसा वापस लाया जाए और ज़रूरी डिस्क्लोज़र हो.

आपके रिटर्न पर इसका सीधा असर नहीं दिखेगा. मक़सद अटके मामलों को जल्दी निपटाना है, और ग़लत कमाई की अलग वसूली से कोई सेटलमेंट करके मुनाफ़ा अपने पास नहीं रख सकेगा. हालांकि, वित्तीय गड़बड़ी जैसे गंभीर मामलों को सेटलमेंट में लाने से सख़्ती कम होने का सवाल भी उठ सकता है.

और क्या बदला?

  • एक्रेडिटेड इन्वेस्टर: सिक्योरिटीज़ मार्केट में कम से कम ₹5 करोड़ का निवेश रखने वाले व्यक्ति, HUF और फ़ैमिली ट्रस्ट, और ₹20 करोड़ वाली कंपनियां भी एक्रेडिटेड इन्वेस्टर बन सकेंगी.
  • विज्ञापन के नियम: म्यूचुअल फ़ंड, PMS और ब्रोकर जैसी संस्थाओं के लिए कॉमन एडवर्टाइज़मेंट कोड आएगा. ब्रांड-स्तर के प्रचार में सेलेब्रिटी को लिया जा सकेगा, लेकिन पहले मंज़ूरी लेनी होगी.
  • गोल्ड-सिल्वर ETF: इनके पीछे रखे सोने-चांदी की स्टोरेज और सुरक्षा के नियम सख़्त होंगे.
  • AIF निवेशकों की सुरक्षा: अब हर तरह के AIF में फ़ंड मैनेजर अपने नुक़सान या ख़र्च की भरपाई फ़ंड के एसेट्स से नहीं कर सकेगा.

तो आम निवेशक को क्या करना चाहिए?

सिर्फ़ SEBI के नए नियमों की वजह से पोर्टफ़ोलियो बदलने की ज़रूरत नहीं है. PRIM आपके काम का तभी है जब आप ₹25 लाख या ज़्यादा के साथ प्रोफ़ेशनल मैनेजमेंट चाहते हों, और तब भी उसकी फ़ीस की तुलना ख़ुद डायरेक्ट प्लान में निवेश से ज़रूर करें. अगर आप पहले से PMS में हैं, तो मैनेजर से पूछें कि नए नियमों के बाद क्या वे IPO, अनलिस्टेड डेट, डेरिवेटिव्स या विदेशी सिक्योरिटीज़ में निवेश करेंगे और इससे आपका रिस्क कितना बदलेगा.

यानी SEBI ने नए दरवाज़े खोले हैं, लेकिन हर दरवाज़े से अंदर जाना ज़रूरी नहीं. कोई भी नया प्रोडक्ट चुनने से पहले उसकी फ़ीस, रिस्क और लिक्विडिटी समझें. नियम बदलने से निवेश के बुनियादी उसूल नहीं बदलते.

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यह भी पढ़ेंः एक ही कैटेगरी के दो फ़ंड, फिर भी टैक्स अलग-अलग क्यों?

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