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इंटरनेशनल ETF में निवेश करना चाहते हैं? ज़रूर देखें ये 4 बातें

किसी ETF का मार्केट प्राइस तेज़ी से चढ़ा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसके निवेश वाले शेयरों ने भी उतना ही कमाया. विदेशी ETF में यह फ़र्क़ इन दिनों बहुत बड़ा हो गया है.

किसी ETF का मार्केट प्राइस तेज़ी से चढ़ा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसके निवेश वाले शेयरों ने भी उतना ही कमाया. विदेशी ETF में यह फ़र्क़ इन दिनों बहुत बड़ा हो गया है.Mukul Ojha/AI-Generated Image

सारांशः म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री के लिए विदेश में निवेश की सीमा भर चुकी है, इसलिए कई इंटरनेशनल ETF की नई यूनिट नहीं बन पा रहीं. नतीजा यह कि जो यूनिट पहले से हैं, वो एक्सचेंज पर उनकी असल क़ीमत से कई गुना दाम पर बिक रही हैं. एक ETF तो हाल के दिनों में अपनी NAV के 3 गुना से ज़्यादा पर बिका और फिर दो दिन में 36% टूट गया. यह लेख बताता है कि ऐसा क्यों हुआ और किसी इंटरनेशनल ETF में पैसा लगाने से पहले कौन सी 4 बातें जांचनी चाहिए.

विदेशी बाज़ार में पैसा लगाने के लिए बहुत से निवेशक इंटरनेशनल ETF चुनते हैं. पर इन दिनों इनमें से कई ETF एक्सचेंज पर उस दाम पर बिक रहे हैं, जो उनकी असल क़ीमत से कई गुना ज़्यादा है.

असल क़ीमत, यानी NAV, और मार्केट प्राइस के बीच के इस फ़र्क़ को प्रीमियम कहते हैं. और जब यह प्रीमियम बहुत बड़ा हो जाए, तो ख़रीदने वाला दरअसल उस चीज़ के लिए ज़्यादा पैसे दे रहा होता है, जिसकी क़ीमत उतनी है ही नहीं.

प्रीमियम इतना बढ़ा कैसे?

इसकी जड़ में डिमांड और सप्लाई का सीधा खेल है. म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री के लिए विदेश में निवेश करने की जो सीमा तय है, वो भर चुकी है. और ETF के लिए जो अलग सीमा थी, वो भी ख़त्म हो गई है. इसलिए फ़ंड हाउस कई इंटरनेशनल ETF की नई यूनिट नहीं बना पा रहे. पर जो यूनिट पहले से मौजूद हैं, उनकी ख़रीद-बिक्री एक्सचेंज पर चलती रहती है. तो जो निवेशक विदेशी बाज़ार में पैसा लगाना चाहता है, उसके पास एक ही रास्ता बचता है कि वो किसी पुराने निवेशक से ही यूनिट ख़रीदे. यूनिट कम और ख़रीदार ज़्यादा, तो दाम चढ़ना ही था.

सितंबर में यह रफ़्तार और तेज़ हो गई. 7 सितंबर से SEBI के नए नियम के तहत ETF का रोज़ का प्राइस बैंड, यानी जिस दायरे में उसका प्राइस उस दिन ऊपर-नीचे हो सकता है, वो पिछले दिन के बंद प्राइस के आसपास तय होने लगा है. पहले यह दो दिन पुरानी NAV के आसपास तय होता था. यानी पहले प्रीमियम एक हद से आगे नहीं जा पाता था और अब हर दिन का चढ़ा हुआ प्राइस ही अगले दिन की शुरुआत बन जाता है.

एक ETF की कहानी, जो सब कुछ समझा देती है

Motilal Oswal Nasdaq Q50 ETF की मिसाल देखिए. यह ETF Nasdaq Q-50 इंडेक्स पर बना है, जिसमें वो 50 कंपनियां हैं जो Nasdaq-100 में आने की कतार में हैं.

तारीख़ (2026) मार्केट प्राइस (₹) NAV (₹) NAV से प्रीमियम
4 सितंबर 141.93 118.74 19.50%
16 सितंबर 275.28 116.69 135.90%
18 सितंबर 396.3 118.14 235.50%
21 सितंबर 317.04 120.23 163.70%
22 सितंबर 253.64 120.17* 111.10%

मार्केट प्राइस एक्सचेंज पर उस दिन का क्लोज़िंग प्राइस है और NAV फ़ंड हाउस की बताई हुई है. प्रीमियम का हिसाब हमारा है. *22 सितंबर को उस दिन की NAV की जगह कारोबार के दौरान का iNAV लिया गया है.

अब इस टेबल में तीन बातें ग़ौर कीजिए

पहली, 4 से 18 सितंबर के बीच ETF का मार्केट प्राइस 179% चढ़ गया. जबकि उसी दौरान उसकी NAV 0.5% घटी, और जिस इंडेक्स पर वो बना है, वो क़रीब 2% गिरा. यानी प्राइस में आई पूरी तेज़ी, अंदर रखे शेयरों की कमाई से नहीं, सिर्फ़ ख़रीदारों की भीड़ से आई थी.

दूसरी, 18 सितंबर को निवेशक ₹118 के एनएवी पर क़रीब ₹396 दे रहे थे. और जिसने उस दिन के क्लोज़िंग प्राइस पर ख़रीदा, 22 सितंबर तक उसके निवेश की क़ीमत 36% घट चुकी थी, जबकि इसके उलट उस दौरान NAV थोड़ी बढ़ी थी.

तीसरी, इतनी गिरावट के बाद भी वो ETF अपनी NAV के दोगुने से ज़्यादा पर बिक रहा था. यानी ख़तरा अभी पूरी तरह टला नहीं था.

इसे एक हिसाब से समझिए. पिछले एक साल में इंटरनेशनल ETF का प्रीमियम आमतौर पर 15 से 20% के आसपास रहता था. अगर यह प्रीमियम वापस उसी स्तर पर लौट आए, तो ₹253 वाले प्राइस से भी इस ETF का दाम 40% से ज़्यादा और गिर सकता है, वो भी तब, जब उसके अंदर के शेयर ज़रा भी न हिलें. यह सिर्फ़ समझाने के लिए लगाया गया हिसाब है, कोई अनुमान नहीं.

NAV और मार्केट प्राइस अलग क्यों हो सकते हैं

हर ETF के दो दाम होते हैं. एक NAV, यानी उसकी हर यूनिट के अंदर रखे शेयरों की असल क़ीमत. और दूसरा मार्केट प्राइस, यानी वो दाम जिस पर आख़िरी ख़रीदार ने एक्सचेंज पर वो यूनिट ख़रीदी.

आम हालात में ये दोनों लगभग बराबर रहते हैं. असल में, अगर मार्केट प्राइस NAV से ऊपर जाने लगे, तो फ़ंड हाउस से NAV पर नई यूनिट बनवाकर एक्सचेंज पर बेच दी जाती हैं और फ़र्क़ ख़त्म हो जाता है.

पर जब नई यूनिट बन ही न सकें, तो यह रास्ता बंद हो जाता है. और तब कम यूनिट और ज़्यादा मांग मिलकर मार्केट प्राइस को NAV से कई गुना ऊपर ले जा सकते हैं. जब फ़र्क़ बहुत बड़ा हो जाता है, तो माहौल ज़रा सा बदलते ही बिकवाली शुरू होती है और दाम तेज़ी से गिरता है.

इसीलिए एक तीसरा आंकड़ा भी देखना ज़रूरी है, iNAV, यानी इंडिकेटिव NAV. यह कारोबार के दौरान थोड़ी-थोड़ी देर में बताया जाता है कि उस वक़्त ETF की एक यूनिट के अंदर की क़ीमत कितनी बैठती है. इंटरनेशनल ETF के मामले में यह एक अंदाज़ा ही होता है, क्योंकि भारत में कारोबार के वक़्त ज़्यादातर विदेशी बाज़ार बंद रहते हैं, और iNAV वहां के पिछले प्राइस और करेंसी की चाल से निकाला जाता है. फिर भी मार्केट प्राइस को इसी से मिलाकर देखना चाहिए.

इंटरनेशनल ETF में पैसा लगाने से पहले ये 4 बातें समझिए!

1. प्रीमियम कितना है. ख़रीदने से पहले मार्केट प्राइस को उस वक़्त के iNAV से मिलाइए. थोड़ा-बहुत प्रीमियम चिंता की बात नहीं. पर जितना बड़ा फ़र्क़, उतना बड़ा जोखिम. और अगर प्रीमियम पिछले साल के आम स्तर, यानी 15-20% से काफ़ी ऊपर है, तो बहुत सावधान रहिए. और जब भी ख़रीदें, लिमिट ऑर्डर लगाइए, ताकि आप अपनी तय क़ीमत से ज़्यादा न चुकाएं.

2. जिस इंडेक्स पर ETF बना है, उसने असल में कितना कमाया. ETF के प्राइस की तेज़ी देखकर यह मत मानिए कि उसके अंदर के शेयरों ने भी उतना ही कमाया. उस इंडेक्स का रिटर्न अलग से देखिए. अगर ETF का प्राइस इंडेक्स से कहीं आगे भाग रहा है, तो वो बढ़त शेयरों की नहीं, प्रीमियम की है.

3. करेंसी का जोखिम. इंटरनेशनल ETF का रिटर्न सिर्फ़ उस बाज़ार के शेयरों से नहीं, रुपये और उस देश की करेंसी, जैसे डॉलर, की चाल से भी तय होता है. अगर रुपया मज़बूत हुआ, तो आपका रिटर्न घटेगा. अगर रुपया कमज़ोर हुआ, तो बढ़ेगा. यह जोखिम हर विदेशी निवेश में रहता है.

4. क्या वही निवेश किसी दूसरे रास्ते से हो सकता है. हो सकता है वही विदेशी बाज़ार आपको किसी दूसरे फ़ंड से, बिना इतने प्रीमियम के मिल जाए. पर दो बातें ध्यान रखिए. ज़्यादातर इंटरनेशनल म्यूचुअल फ़ंड में अभी एकमुश्त पैसा लगाना बंद है. और जो फ़ंड ऑफ़ फ़ंड्स इन्हीं ETF में पैसा लगाते हैं, वो इन ETF को एक्सचेंज के प्राइस पर ही गिनते हैं. यानी वही प्रीमियम उनकी NAV में भी छिपा होता है, और वहां जाकर भी आप उससे नहीं बचते. GIFT City के ज़रिए भी विदेशी फ़ंड में पैसा लगाया जा सकता है, जहां दाम आमतौर पर बाज़ार के हिसाब से ही रहते हैं. पर वहां की अपनी शर्तें, कम से कम निवेश की रक़म और टैक्स के नियम अलग हैं, इसलिए पहले उन्हें अच्छी तरह समझ लीजिए.

पोर्टफ़ोलियो में विदेशी निवेश कितना हो?

विदेशी बाज़ार में पैसा लगाना डायवर्सिफ़िकेशन के लिए अच्छा है, क्योंकि इससे आपका पूरा पैसा सिर्फ़ भारत की अर्थव्यवस्था पर नहीं टिका रहता.

पर कितना लगाना है, यह बाज़ार का माहौल देखकर नहीं, अपने गोल और अपनी जोखिम सहने की ताक़त देखकर तय कीजिए. ज़्यादातर लोगों के लिए पोर्टफ़ोलियो का 5 से 10% विदेशी निवेश में रखना काफ़ी रहता है. और जिन्हें इसकी अच्छी समझ है, और ज़्यादा डायवर्सिफ़िकेशन चाहिए, वो इससे ज़्यादा भी रख सकते हैं.

आख़िरी बात

ETF को आमतौर पर सबसे सीधा और सस्ता निवेश माना जाता है, जिसका दाम उसके अंदर के शेयरों के साथ चलता है. और आम हालात में यह सही भी है.

पर जब नई यूनिट बनना बंद हो जाए, तो वही ETF किसी आम शेयर की तरह, सिर्फ़ मांग और सप्लाई के भरोसे चलने लगता है. ऐसे में आप मार्केट प्राइस नहीं, बल्कि वो कमी ख़रीद रहे होते हैं जो सीमा भरने से बनी है.

इसलिए किसी भी इंटरनेशनल ETF में पैसा लगाने से पहले, उसका प्राइस नहीं, उसकी NAV पहले देखिए. अगर प्राइस NAV से बहुत ऊपर है, तो रुक जाना ही सबसे समझदारी की बात है.

यह भी पढ़ें: गोल्ड ETF का सोना अब चोरी-फ़्रॉड से होगा सुरक्षित, SEBI ने सख्त किए नियम

ये लेख पहली बार सितंबर 28, 2026 को पब्लिश हुआ.

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