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क्या AI से स्टॉक चुनना फ़ायदेमंद हो सकता है?

AI रिसर्च असिस्टेंट बन सकता है, लेकिन अपनी सलाहों के लिए वह जवाबदेह नहीं है

AI रिसर्च असिस्टेंट बन सकता है, लेकिन अपनी सलाहों के लिए वह जवाबदेह नहीं हैAditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः AI लिखने से लेकर रिसर्च तक, ज़िंदगी के लगभग हर हिस्से को आसान बना सकता है. लेकिन निवेश को बेहतर बनाने में यह मदद नहीं कर सकता. इसके पास गहरी समझ हो सकती है, लेकिन जिन फ़ैसलों की सलाह वह देता है, उनकी ज़िम्मेदारी वह नहीं लेता. आख़िरकार पैसा तो निवेशक का ही लगता है, AI का नहीं.

पिछले हफ़्ते मैंने एक आर्टिकल पढ़ा, जिसमें बताया गया था कि लोग स्टॉक्स चुनने के लिए AI का इस्तेमाल कैसे कर रहे हैं. उसमें एक CEO का उदाहरण था, जिसने AI से कहा कि वह ऐसे पैरामीटर तय करे और ऐसे स्टॉक्स बताए, जो सिर्फ़ 10 हफ़्तों में डबल हो जाएं. (लोगों, आपने मुझे गुस्सा होते देखने का एक दुर्लभ मौक़ा गंवा दिया. 10 हफ़्ते? 10 हफ़्ते? सच में? 10 हफ़्ते?)

अगर रिटेल निवेशक AI का इस्तेमाल इसी तरह कर रहे हैं या करने की योजना बना रहे हैं, तो इसमें दो बेहद ख़तरनाक व्यवहार सामने आते हैं. पहला, पैरामीटर तय करने की ज़िम्मेदारी AI को सौंप देना. दूसरा, निवेश का टाइमफ़्रेम. इस लेख में हम बताते हैं कि अहम निवेश एनालेसिस को AI पर छोड़ना क्यों ख़तरनाक है और वैल्यू रिसर्च में हम AI का इस्तेमाल किस तरह करते हैं.

मैनेजमेंट की बातों को समझने में AI नाकाम रहता है

सबसे अहम निवेश एनालेसिस से शुरुआत करते हैं, यानी मैनेजमेंट की ईमानदारी. सिर्फ़ उन मैनेजमेंट को छांट देना काफ़ी नहीं है, जो कॉरपोरेट गवर्नेंस की गड़बड़ियों में फंसे हों. असल बात है ईमानदारी.

क्या मैनेजमेंट भरोसेमंद है? क्या वह निवेशकों को पहले से चेतावनी देता है, अगर कारोबार में सुस्ती आने वाली हो (बहुत कम लोग ऐसा करते हैं) या मुश्किल तिमाहियां सामने हों? हमने देखा है कि कुछ मैनेजमेंट वाक़ई ऐसे संकेत पहले दे देते हैं. हम ख़ास तौर पर ऐसे पारदर्शी लोगों द्वारा चलाई जा रही कंपनियों को खोजते हैं.

ईमानदारी इतना कम आंका गया पैरामीटर है कि ज़्यादातर निवेशक इसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं और ग्रोथ या बाज़ार की पसंद को ज़्यादा महत्व देते हैं. इसे समझने का सबसे सही तरीक़ा है सालाना रिपोर्ट और कॉन्फ़्रेंस कॉल से जुड़ी बातों को पढ़ना, और यह देखना कि मैनेजमेंट मुश्किल सवालों पर कैसे प्रतिक्रिया देता है.

उनका लहज़ा कैसा है? रक्षात्मक? यथार्थवादी? अगर कोई व्यक्ति जानता है कि AI से मैनेजमेंट की ईमानदारी कैसे परखी जाए, तो ज़रूर बताइए. हमें अब तक इसका कोई असरदार तरीक़ा नहीं मिला है.

इन्हीं कॉन्फ़्रेंस कॉल्स में इंडस्ट्री ट्रेंड बदलने के शुरुआती संकेत भी मिलते हैं. मैनेजमेंट जिन छोटे-छोटे संकेतों की बात करता है, उनसे पता चलता है कि तिमाही या छमाही की तेज़ रेवेन्यू ग्रोथ या मार्जिन कितने टिकाऊ हैं. मसलन, अगर मैनेजमेंट भविष्य की मांग को लेकर अनिश्चितता की बात खुलकर करता है, तो ऐसे ईमानदार खुलासे हमारी पकड़ में तुरंत आ जाते हैं.

आमतौर पर मैनेजमेंट यह नहीं कहता कि रेवेन्यू घटेगा, लेकिन भरोसेमंद लोग बदलते रुझानों की ओर इशारा ज़रूर करते हैं. उल्टा भी सही है.

भरोसेमंद मैनेजमेंट यह भी बताता है कि कब आउटलुक साफ़ होने लगता है और आगे ज़्यादा कारोबार की उम्मीद दिखती है. लेकिन ये बदलाव शुरुआत में नंबरों में नहीं दिखते. ये मैनेजमेंट की बातों में दिखते हैं. AI से इन्हें समझने की उम्मीद करना एक बहुत बड़ी छलांग है.

वापसी कर रहे सेक्टरों को AI नहीं पहचान सकता

फिर आते हैं उन ‘हॉट’ स्टॉक्स या सेक्टरों पर, जो बाज़ार की पसंद बन जाते हैं. ऐसे दौर में किसी ख़ास तरह की कंपनियों या पूरे सेक्टर को बाज़ार बहुत ज़्यादा पसंद करने लगता है. जब क़ीमत और फ़ंडामेंटल्स में इतना बड़ा अंतर हो, तो वहां से दूरी बनाए रखना ही बेहतर होता है. हाल के वर्षों में इसके उदाहरण रहे हैं रेलवे स्टॉक्स की रैली, PSU रैली और नए-ज़माने की प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों को लेकर बना उत्साह.

दरअसल, PSU रैली के दौरान हमने अपनी एक रेकमंडेशंस पर ‘सेल’ कॉल भी दी थी, जब वैल्यूएशन टिकाऊ स्तर से बहुत आगे निकल गए थे. यहां अहम बात यह है कि कोई नहीं जानता कि ये हॉट स्टॉक्स या सेक्टर कब बाज़ार की पसंद रहना बंद करेंगे.

जब इनके स्टॉक्स नए हाई पर पहुंचते हैं, तो ऐसा लगता है कि अब फ़ंडामेंटल्स की अहमियत नहीं रही और नई कहानी ही सब कुछ है. लेकिन हक़ीक़त यह है कि फ़ंडामेंटल्स कभी अहमियत खोते नहीं. आख़िरकार वही हावी होते हैं. कई बार ऐसे स्टॉक्स, जो कभी बाज़ार के चहेते रहे हों, अपनी ऊंचाइयों से 70-80, यहां तक कि 90 फ़ीसदी तक गिरते देखे गए हैं. इस नज़ाकत को AI से समझने की उम्मीद करना आसान नहीं है.

जब बाज़ार अपने पसंदीदा सेक्टर चुनता है, तो अक्सर नज़रअंदाज़ किए गए सेक्टरों में ही सबसे ज़्यादा वैल्यू छिपी होती है. जो लोग काफ़ी समय से बाज़ार में हैं, उन्हें याद होगा कि 2008 के फ़ाइनेंशियल क्रैश से पहले कैपिटल गुड्स, कंस्ट्रक्शन और इंजीनियरिंग कंपनियों की रैली के दौरान FMCG स्टॉक्स इतने अनदेखे थे कि वे ऐसे निचले स्तरों पर थे, जो पहले कभी नहीं देखे गए थे.

तब ₹100 में HUL ख़रीदा जा सकता था (काश तब पैसे होते!). इसके लिए दो दशक पीछे जाने की भी ज़रूरत नहीं है. बस एक साल पहले ही कुछ ऑटो और ऑटो एंसिलरी स्टॉक्स बाज़ार की नज़र से उतर गए थे. अगर किसी ने उस वक़्त उल्टा दांव (contrarian call) लगाया होता, तो आज ठीक-ठाक मुनाफ़े में होता.

हमारी हाल की दो रेकमंडेशन भी सही समय पर साबित हुईं, जब सुस्ती का दौर ख़त्म हुआ. सच कहें तो हमें यह नहीं पता था कि साइकल कब पलटेगा. हमने फ़ंडामेंटल्स, मैनेजमेंट और वैल्यूएशन जैसे पहलुओं पर ही ध्यान दिया. इतने सारे फैक्टर साथ चल रहे हों, वहां AI से ऐसे नज़रअंदाज़ स्टॉक्स पहचानने की उम्मीद करना ख़तरनाक है. हर स्टॉक या सेक्टर वापसी नहीं करता.

AI यथार्थवादी निवेश अवधि नहीं सुझा सकता

अब जब ऊपर के उदाहरणों के लिए हम लगभग दो दशक पीछे जा चुके हैं, तो निवेश अवधि की बात करते हैं. AI से यह कहना कि वह ऐसे स्टॉक्स बताए, जो 10 हफ़्तों में डबल हो जाएं, ऐसा टाइमफ़्रेम है, जो मैंने अपने दो-दशक से ज़्यादा के बाज़ार अनुभव में नहीं देखा.

एक साल में डबल? हां, ऐसे सपने बेचने वाले बहुत मिल जाएंगे. लेकिन 10 हफ़्तों में डबल? (इससे बेहतर तो कुछ पैसा दान ही कर दिया जाए, किसी का भला तो होगा.)

हम यह बात कई बार कह चुके हैं और आगे भी कहते रहेंगे. कंपनियां आम तौर पर इतनी जल्दी अपनी कमाई डबल नहीं करतीं और 10 हफ़्तों में तो बिल्कुल नहीं. इस दौरान या एक-दो साल में स्टॉक्स के डबल होने की उम्मीद रखना हक़ीक़त से दूर है.

बिज़नेस के अपने साइकल होते हैं, सेक्टरों के अपने साइकल होते हैं, यहां तक कि डिफ़ेंसिव सेक्टरों के भी. ये साइकल हफ़्तों या कुछ तिमाहियों में नहीं पलटते. कोई भरोसे के साथ नहीं बता सकता कि ये कब बदलेंगे. पिछले हफ़्ते हमने एक ऐसी रेकमंडेशन का ज़िक्र किया था, जो COVID-19 के दौरान गंभीर सुस्ती से गुज़री.

अगर उस वक़्त घबराकर उसे बेच दिया होता, तो आज मल्टीफ़ोल्ड रिटर्न नहीं देख रहे होते. तर्कसंगत तरीक़ा यही है कि लंबे समय के लिए निवेश किया जाए, ताकि साइकल अपने पूरे असर के साथ सामने आ सकें और ठीक-ठाक रिटर्न की संभावना बने. इसके अलावा कुछ भी पैसा दांव पर लगाने जैसा है. AI से शॉर्ट-टर्म दांव पूछना निवेश नहीं है.

AI की कोई जवाबदेही नहीं

अब इस हफ़्ते के आख़िरी और सबसे अहम बिंदु पर आते हैं. निवेश के फ़ैसले. मान लीजिए AI ऐसे स्टॉक्स बता भी दे, जो 10 हफ़्तों में डबल हो सकते हैं और किसी तरह ऊपर बताए गए सारे अहम पहलुओं को भी ध्यान में रख ले.

तो निवेश कहां किया जाए? एक में? कुछ में? पूरे पोर्टफ़ोलियो में? किसी एक को चुनने से रिस्क कम होगा या ज़्यादा? क्या यह काफ़ी डाइवर्सिफ़ाइड है? इंसानी समझ को शामिल किया जाए या नहीं, लेकिन मेहनत की कमाई AI के भरोसे लगाना, क्या यह ऐसा रिस्क है, जिस पर आंख बंद करके दांव लगाया जाए? यह निवेश है या सट्टा? फ़ैसला खुद करना होगा.

वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र में हम AI का इस्तेमाल कैसे करते हैं

अगर कोई व्यक्ति यह जानना चाहता है कि हम AI का इस्तेमाल किस तरह करते हैं, तो हमारी प्रक्रिया समझिए:

  • हम जिन कंपनियों को कवर करते हैं, उनके घटनाक्रम पर लगातार नज़र रखते हैं. तिमाही, छमाही, सालाना और लॉन्ग-टर्म परफ़ॉर्मेंस देखते हैं.
  • हम AI का इस्तेमाल लंबी अवधि के कॉरपोरेट (स्टॉक नहीं) मूवमेंट, स्ट्रैटेजी और मैनेजमेंट फ़ैसलों को समझने के लिए करते हैं.
  • इंडस्ट्री डायनैमिक्स, कॉम्पिटिशन और दूसरी कंपनियों के मैनेजमेंट क्या कह रहे हैं, यह समझने में भी AI मदद करता है.
  • हम बदलते इंडस्ट्री ट्रेंड देखते हैं. क्या इंडस्ट्री में ज़्यादा कैपेसिटी जुड़ रही है, जिससे सबकी मुनाफ़ाख़ोरी घट सकती है? क्या सेक्टर भीड़-भाड़ वाला हो रहा है या कंसॉलिडेशन की ओर बढ़ रहा है?

लेकिन, AI का इस्तेमाल हम इन बातों के लिए नहीं करते:

  • मैनेजमेंट की ईमानदारी परखने के लिए नहीं. वहां उनके शब्द ज़्यादा मायने रखते हैं.
  • हॉट स्टॉक्स और सेक्टरों से हम दूरी रखते हैं.
  • नज़रअंदाज़ सेक्टर AI से नहीं ढूंढते, बल्कि ख़ुद रिसर्च करते हैं.
  • कॉन्ट्रेरियन कॉल लेने का काम भी हमारी टीम ख़ुद करती है.
  • निवेश फ़ैसले लेने के लिए AI का इस्तेमाल नहीं करते. आख़िरी फ़ैसला हमारी समझ पर आधारित होता है.
  • और सबसे अहम, निवेश अवधि तय करने के लिए भी AI का इस्तेमाल नहीं करते. अगर 10 हफ़्तों का डबल-बैगर खोजना है, तो Stock Advisor सही जगह नहीं है.

AI किसी कंपनी को गहराई से समझने का बेहतरीन टूल है. लेकिन इतने सारे पहलुओं के बीच निवेश का फ़ैसला AI पर छोड़ देना, पैसे के साथ बड़ा जोखिम लेना है. AI का इस्तेमाल रिसर्च के लिए करें, यह तय करने के लिए नहीं कि पैसा कहां लगाया जाए, और यह जानने के लिए तो बिल्कुल नहीं कि 10 हफ़्तों में पैसा कहां डबल होगा.

अगर शेयर बाज़ार में वेल्थ बनाने के लिए एक भरोसेमंद और सोची-समझी प्रक्रिया चाहिए, तो वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र उस रास्ते पर साथ दे सकता है.

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Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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