
वो कौन सी दो सबसे बड़ी ग़लतियां हैं, जो इक्विटी निवेशक करते हैं? पहली है, बेचने में जल्दबाज़ी करना, और दूसरी ग़लती है बेचने में देर कर देना। और मैं ये नहीं कह रहा कि एक ही निवेश में, या एक ही समय में वो ऐसा करते हैं। मैं ये भी नहीं कह रहा कि कोई एक ही निवेशक ये सब करता है-मगर, ऐसा अक्सर होता है।
मैंने हाल ही में इसी विषय पर, प्रसिद्ध निवेशक और फ़ंड मैनेजर हॉवर्ड मार्क्स को पढ़ा। हॉवर्ड मार्क्स एक सफल फ़ंड मैनेजर रहे हैं, और निवेश पर अच्छा लिखने वाले लोगों में से हैं। उनकी, निवेश पर लिखी ज़्यादातर बातें मेमो के तौर पर होती हैं और काफ़ी लोकप्रिय हैं। यहां तक की ख़ुद वॉरेन बफ़ेट ने कहा है कि जब मार्क्स के मेमो आते हैं, तो वो सबकुछ छोड़ कर पहले उसे पढ़ते हैं।
मार्क्स का एक मेमो इस कॉन्सेप्ट की शानदार मिसाल है। इस मेमो का नाम है, ‘sell too early’ यानि बहुत जल्दी बेच देना, इसमें ये बात बहुत अच्छे से उभर कर आई है: हर कोई सोचता करता है कि काश अमेज़न को 1998 में पहले ही दिन $5 में ख़रीदा होता, क्योंकि अब ये बढ़ कर 660x यानि $3,304 का हो गया है। मगर ऐसा कौन है जो इसे 1999 में भी होल्ड करता, जब ये $85 का हो गया था - दो साल के भीतर 17x? उन लोगों में कौन ऐसा होगा, जिसने 2001 में भी इसे अपने पास रखा और घबराए नहीं, जब इसका दाम 93% गिर कर $6 हो गया? और किसने 2015 के अंत तक भी बेचा नहीं होगा, जब इसने $600 के आंकड़े को हिट किया - जो 2001 के निचले स्तर से 100x ज़्यादा था। मगर जिसने भी इसे $600 में बेचा, उसने निचले स्तर पर जाने के बाद की बढ़त का, महज़ शुरुआती 18% ही हासिल किया।
इस धर्मसंकट को ठीक से समझने के लिए, आप कृपया इस पैराग्राफ़ को एक बार और पढ़ें और इन आंकड़ों के बारे में, एक और बार सोचें। अमेज़न के केस में, सिवा जेफ़ बेज़ोस और कुछ शुरुआती IPO से पहले के निवेशकों के, ये यात्रा किसी ने भी पूरी नहीं की होगी। आम निवेशकों में से जिन्होंने भी IPO में निवेश किया होगा, वो कभी इसके साथ नहीं बने रहे होंगे। मैं ख़ुद एक, ख़रीदो-और-होल्ड-करो के सिद्धांत पर डटा रहने वाला निवेशक हूं, मगर मैं भी किसी-न-किसी मौक़े पर, इस निवेश से बाहर निकल ही गया होता। पर अमेज़न तो दूर की बात है, इसी तरह के कई उदाहरण हमारे अपने ही घर में मौजूद हैं।
इन सब बातों का निचोड़ ये है कि जब ज़्यादातर लोगों को लगता है उन्होंने काफ़ी पैसा बना लिया है, तो वो अपने स्टॉक्स बेच देते हैं। आख़िर आप एक स्टॉक ख़रीदते हैं और जब लगता है कि ये उतना बढ़ गया है, जितना आपके निवेश के दौरान बढ़ सकता था, तो आप उसे बेच देते हैं। ये प्रॉफ़िट-बुकिंग है और एक निवेशक के लिए, यहीं मुनाफ़ा लॉक-इन करना कहलाता है। इक्विटी निवेशकों में एक बात आमतौर पर कही जाती है, कि प्रॉफ़िट बुक करने से किसी को कभी घाटा नहीं हुआ। ये स्टेटमेंट एकदम सटीक लगता है और इसे सुन कर, प्रॉफ़िट बुक करना आसान काम लगता है। इसी की तरह कितनी ही बातों में, ऐसे व्यवहार की जड़ें उसके मनोविज्ञान में होती हैं न की तर्क में। लोग डरते हैं कि उनका मुनाफ़ा कहीं हाथ से फिसल न जाए, या कम न हो जाए। इसमें ग्लानि और शर्म की कोई जगह नहीं है। किसी ट्रेड को फ़ायदे पर ख़त्म करने की सफलता का एहसास गज़ब का होता है।
एक निवेशक के नज़रिए से मार्क्स कहते हैं कि प्रॉफ़िट बुक करना, मार्केट-टाईमिंग जैसा है, ये शायद ही कभी कारगर होता हो, और जब होता है तब भी ये एक एक्सीडेंट ही कहलाएगा। चार्ली मंगर ने इसी विषय पर कहा है कि मार्केट-टाईमिंग की वजह से बेचना, निवेशक को ग़लत होने के दो कारण देता है: मंदी आए या न भी आए, और अगर आए, तो उन्हें ये पता करना होगा कि फिर से निवेश में उतरने का सही समय कौन सा है। बदक़िस्मती से, प्रॉफ़िट बुक करना और नुकसान से बचना सफलता का भ्रम खड़ा करता है।
प्रॉफ़िट बुक करने का दूसरा पहलू उतना ही ख़राब, इसका दूसरा जोड़ीदार है, और वो है, बेजान निवेश को होल्ड किए रहना। पर इसका मनोविज्ञान ठीक उलटा है। निवेशक को बहुत तेज़ी से प्रॉफ़िट बुक करने के लिए जीत प्रेरित करती है। और ख़राब निवेश को होल्ड करने में उनकी प्रेरणा होती है, कि हार कर बाहर नहीं निकलना है। वो इस उम्मीद में भी फंसे रह सकते हैं कि कभी-न-कभी, कुछ तो बेहतर होगा। इसका नतीजा ये होता है कि निवेशक अपनी जीती बाज़ी बेच देते हैं और हारी बाज़ी थामे रहते हैं।
ये सब कुछ हमेशा ही चलता रहता है, मगर फिर भी, पिछले दो साल के दौरान मैने ऐसा ग़लत क़िस्म का ख़रीदना-बेचना कुछ ज़्यादा ही देखा है, और इसकी वजह समझना भी आसान है। हालांकि, अब जैसे-जैसे कोविड का डर कम हो रहा है, निवेशकों को जोखिम और अवसर, फ़ायदे और नुकसान को लेकर अपने रवैये पर फिर से ग़ौर करना चाहिए।





