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आत्मनिर्भर इक्विटी मार्केट

FII के बड़े आउटफ़्लो का भारतीय इक्विटी मार्केट पर असर ख़त्म हो जाना एक अच्छा बदलाव है।

FII के बड़े आउटफ़्लो का भारतीय इक्विटी मार्केट पर असर ख़त्म हो जाना एक अच्छा बदलाव है।

एक या दो दशक के स्टैंडर्ड के मुताबिक़, सेंसेक्स शायद अब तक 30,000-35,000 प्वाईंट नीचे होना चाहिए था और निफ़्टी को 10,000 के नीचे। कई भारतीय इक्विटी निवेशक ख़त्म हो गए होते और कई बरसों-बरस के लिए ख़ौफ़ज़दा हो कर बाज़ार से दूर।

कैपिटल मार्केट से आऊट-फ़्लो की वजह से इक्विटी इकठ्ठा करने के कई कॉर्पोरेट प्लान कुचले गए होते और भारतीय बिज़नस में कुछ महीनों या शायद एक-दो साल के लिए उदासी का बादल छा गए होते। इस पूरे परिदृष्य में कुछ भी अजीब नहीं है, हमने ऐसा कई बार देखा है। मिसला के तौर पर, 2000 के डॉटकॉम क्रैश के बाद और और फिर 2008 के ग्लोबल फ़ाईनेंशियल क्राईसिस के दौरान।

तो आप शायद सोच रहे होंगे कि मैं ये क्यों कह रहा हूं कि 2000 और 2008 जैसे हादसे शायद दोबारा हो सकते थे मगर नहीं हुए? बात सरल है-कि विदेशी और भारतीय निवेशकों की ताक़त का संतुलन बदल गया है। इसके पहले के क्रैश में, विदेशी अपना पैसा ले कर भाग गए और भारतीय इतना निवेश कर ही नहीं रहे थे कि वो विदेशी निवेशकों से तुलना कर सकें। ये सिर्फ़ धन की मात्रा की बात नहीं है-FII की अपेक्षाओं ने भी मार्केट को और ज़्यादा मज़बूत बना दिया। अब शक्ति का संतुलन उलट गया है।

ये सिर्फ़ कोई सतही समझ होने जैसी बात नहीं है। यहां मैं एक डेटा अनालेसिस आपसे शेयर कर रहा हूं जिसे वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाईज़र ने तैयार किया था: जनवरी 2008 से फ़रवरी 2009 तक, FII ने ₹59,669 करोड़ निकाले जबकि घरेलू संस्थानों ने ₹73,304 करोड़ निवेश किए और सेंसेक्स 56 प्रतिशत तक गिरा। हाल के कुछ समय के उदाहरण बिल्कुल ही अलग तरह के हैं। फ़रवरी 2018 से जनवरी 2019 तक, FII ने ₹50,671 करोड़ निकाले जबकि घरेलू निवेशकों ने ₹1,10,312 करोड़ निवेश किए और सेंसेक्स क़रीब-क़रीब फ़्लैट रहा (+ 0.81 प्रतिशत)। अब, पिछले साल अक्टूबर से लेकर कर कुछ दिनों पहले तक, FII ने एक बड़ी रक़म निकली, जो ₹1.3 लाख करोड़ की रही जबकि घरेलू निवेशकों ने इसके मुक़ाबले में क़रीब ₹1.5 लाख करोड़ की रक़म का निवेश किया। नतीजा-मार्केट सिर्फ़ 10.6 प्रतिशत नीचे गए।

अगर ये 2008 का समय होता, तो इस तरह के आउटफ़्लो से न सिर्फ़ लंबे समय के लिए मार्केट क्रैश करता, बल्कि इससे बचे-खुचे घरेलू निवेशक भी डर कर दूर हो गए होते। जिस तरह की अनिश्चितिता और संदेह का डर आजकल दुनिया भर में है, उसे देखते हुए लगता है कि स्टॉक मार्केट जैसे गिरे ही नहीं हैं। दो दशकों से भारतयी इक्विटी मार्केट की दशा और दिशा के प्रभावी कारक होने के बाद, FII अब भारतीय धन के सामन दोयम दर्जे का रोल अदा कर रहे हैं। सामान्यतया, जब सबकुछ अच्छा चल रहा हो और सभी का नज़रिया भी एक सा ही हो, तो ये सब मायने नहीं रखता है। हालांकि, आज के दौर में, बदलाव की क्रांतिकारी प्रकृति उभर कर सामने आ जाती है।

ऐसा क्यों हुआ? सबसे क़ारगर वजह है कि भारत के मार्केट में इन-फ़्लो की नेचर बदल गई है। इस बदलाव को सपोर्ट करने वाले तीन स्तंभ हैं, जो इन अक्षरों के सूप में आपको नज़र आएंगे: NPS, EPFO, SIP. कुछ साल पहले, जब भारतीय इक्विटी मार्केट पूर्णकालिक तौर पर पर FII निवेश के ग़ुलाम थे, ये सब उस तरह से नहीं मौजूद थे जैसे आज हैं। इन तीनों के बीच, भारतीय मार्केट में इनफ़्लो 1.75 लाख करोड़ के आस-पास हैं। हालांकि, ये उस फ़्लो की क्वालिटी है जो मात्रा से कहीं भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है। ये पैसा लगातार आने वाला है और लंबे वक़्त का है। EPFO और NPS के केस में, इसकी क़रीब-क़रीब गारंटी ही है कि सिर्फ़ लगातार ही न हो बल्कि ये अनुमान के मुताबिक़ बढ़ता भी रहे। और ये आउटफ्लो में भी कभी नहीं बदलेगा (ये बात ज़रा बड़ी है, मगर तर्कसंगत है)। ऐसी स्थितियां दूसरे मार्केट में आम हैं मगर भारत में एक नई स्थिति है। ‘म्यूचुअल फ़ंड सही’ कैंपेन ने इक्विटी SIP के निवेश को बढ़ा कर क़रीब 10,000 करोड़ प्रतिमाह पर पहुंचा दिया है। ये पैसा आसानी से ख़त्म नहीं होता और आसानी से बाहर भी नहीं जाता। मूलतः ये तीन स्रोत हैं जिनकी वजह से भारत में इक्विटी निवेश का गरा लोकतंत्रीकरण हुआ है और ये प्रक्रिया अभी शुरु ही हुई है।

कई दूसरे क्षेत्रों में, ‘आत्मनिर्भर भारत’ एक लंबे समय की मेहनत और सतत प्रयास मागेंगा। हम सभी को खुश होना चाहिए कि इक्विटी मार्केट्स में, ये स्थिति पहले ही आ गई है।

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