
बचत और निवेश पर अच्छा क्या है और ख़राब क्या, इसे लेकर साफ़-साफ़ बातें अच्छी और आसान लगती हैं. डाइवर्सिफ़ाइड फ़ंड बनाम थीमैटिक, टर्म इंश्योरेंस बनाम यूलिप, और स्टॉक बनाम डेरायवेटिव पर लिखने के लिए बहुत सोचने की ज़रूरत भी नहीं. इसके ठीक उलट, 2023 के बजट (budget 2023-24) ने जो सवाल खड़े किए हैं, वो बचत करने वालों के सामने कई साल तक मुंह बाए खड़े रहेंगे. हालांकि, इन्हें लेकर शायद ही कोई साफ़-साफ़ जवाब कभी हो. कम-से-कम ऐसा जवाब तो नहीं ही होगा जो बहुत से लोगों के लिए सही हो.
और हां, मैं नई टैक्स रिज़ीम (new tax regime) को लेकर होने वाले बदलावों की बात कर रहा हूं, जो कम छूट और कम रेट के सिद्धांत पर आधारित हैं. नई स्कीम का तर्क है कि बजाए लोगों को ऐसे नियमों में बांधने के जो उनके व्यवहार को नियंत्रित करें, आर्थिक फ़ैसले लेने की आज़ादी देना बेहतर है. ये एक अच्छी और सही सोच है. हर किसी की आर्थिक ज़रूरतें अलग होती हैं और इसका कोई मतलब नहीं कि सरकार उन्हें बताए कि उन्हें अपने पैसे कैसे बचाने चाहिए. इस नज़रिए में टैक्स देने वालों के हाथों में ज़्यादा पैसा दिया जाना बेहतर माना जाता है, ताकि हर कोई ख़ुद तय करे कि वो अपने पैसे का क्या करना चाहेगा.
बुनियादी तौर पर इसमें कुछ ग़लत नहीं. जिस कोशिश में 'डायरेक्ट टैक्स कोड' (Direct Tax Code) एक दशक पहले असफल रहा; नई टैक्स रिज़ीम ने उसे अमली-जामा पहना दिया है. एक ऐसा आसान सिस्टम जिसमें रेट (rate) कम है और बहुत कम छूट (exemptions) है. सोच और अमल, दोनों लिहाज़ से ये बेहतर है. असल में बुनियादी तौर पर छूट से उन्हें ही फ़ायदा पहुंचता है जो संपन्न हैं, सिस्टम का फ़ायदा उठा सकते हैं और इस तरह से, जितना अदा करना चाहिए, उससे कम टैक्स देते हैं. इससे भी बड़ी बात है कि एक समानांतर सिस्टम, जिसमें दो सिस्टम एक साथ कई साल तक चलते रहें, ऐसा करने का बेहतर तरीक़ा होता है. जिसके लिए एक बात और साफ़ हो गई है कि धीरे-धीरे सरकार नए सिस्टम की तरफ़ ले जा रही है. नए सिस्टम को डिफ़ॉल्ट सिस्टम बना देना इसी बात का संकेत है.
हालांकि, इस लेख को पढ़ने वाले हर किसी की मुश्किल साफ़ दिखाई देती है. हर साल, दिसंबर और जनवरी के बीच पूरे देश में एक रिवाज़ रहा है, जब कर्मचारी अपनी कंपनी को टैक्स-बचत के लिए किए गए निवेश के बारे में बताते हैं. जिन लोगों ने टैक्स बचाने के लिए कोई बचत नहीं की होती, तब उन्हें अक्सर एक दोस्ताना अकाउंट इंचार्ज बताता है कि अगर वो X निवेश करेंगे, तो टैक्स में Y पैसा बचा सकेंगे. मैं समझता हूं, हर कोई नहीं तो भी ज़्यादातर वेतन पाने वाले मेरे पाठक, इस अनुभव से गुज़रे होंगे. क़रीब-क़रीब हर नौकरी करने वाला इस X निवेश से Y पैसा बचाने की क़वायद से बचत और निवेश की दुनिया में क़दम रखता है.शुरुआत में, ये टैक्स की एक छोटी सी बचत ही होती , पर वक़्त के साथ यही बचत लोगों को ख़र्च करने वालों की श्रेणी से निकाल कर बचत करने वालों में बदल देती है, और तब ये छोटी बात, बड़ी हो जाती है.
नई टैक्स रिज़ीम में शिफ़्ट होना इसे ख़त्म कर देगा. और मेरी समझ में, ये टैक्स के नए तरीक़े का एक बहुत बड़ा नकारात्मक पहलू है. ये बदलाव कोई दूर भविष्य की बात नहीं बल्कि इसी साल होने वाला है. मीडिया में की जा रही टैक्स की कैलकुलेशन के उलट, नए और पुराने की तुलना में, नया सिस्टम कम टैक्स देने वालों के लिए अभी ही फ़ायदे का सौदा हो गया है. मीडिया की कैलकुलेशन मान कर चल रही है कि हर कोई बचत करता है. हर व्यक्ति टैक्स बचाने के लिए ₹2 लाख का निवेश कर सकता है. ये मज़ाक की हद तक अवास्तविक है. आख़िर कितने लोग हैं जो ₹7-9 लाख कमाते हैं और हर साल ₹2 लाख बचा पाते हैं?
ज़्यादातर लोग, साल भर की कमाई के इस स्तर में क़रीब ₹50,000 से ₹75,000 ही बचा पाते हैं. इन लोगों को कुछ पैसा निवेश करके टैक्स बचाने, और नई रिज़ीम में स्विच करके टैक्स बचाने के बीच चुनाव करना है! और ये एक हादसे जैसा है.
ख़ैर, इसे सिर्फ़ पॉलिसी के स्तर पर ही रोका जा सकता है. हम बचत करने वालों के लिए, अब सवाल ये रह गया है कि इसे लेकर हम क्या करेंगे? तो, इसका जवाब है कि हम अपनी बचत और निवेश की ज़िम्मेदारी ख़ुद लें. धीरे-धीरे, नई स्कीम ही बचेगी और टैक्स की रियायतें ख़त्म हो जाएंगी. इसके बाद, जिन लोगों की सोच, बचत और निवेश की है वही बचत और निवेश करेंगे, बाक़ी मुश्किलों का सामना करेंगे.






