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मुनाफ़ा ही सब कुछ है

हम इस साल भी आपके लिए देश की 100 सबसे ज़्यादा मुनाफ़े वाली कंपनियों की अपनी लिस्ट लाए हैं

हम इस साल भी आपके लिए देश की 100 सबसे ज़्यादा मुनाफ़े वाली कंपनियों की अपनी लिस्ट लाए हैं

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जून 2023 की 'वेल्थ इनसाइट' का कवर फ़ीचर 'प्रॉफ़िट 100' एक सालाना एक्सरसाइज़ है, जो कई साल से की जा रही है. हाल तक मैं समझता था कि ये निवेशकों के बड़े काम की, पर एक रुटीन एक्सरसाइज़ है. इस फ़ीचर के लिए हमारी टीम ने डेटा को एनेलाइज़ करने का एक अनोखा और असरदार तरीक़ा तैयार किया है. फिर भी ऐसा लगता था कि कॉन्सेप्ट या थ्योरी के स्तर पर इस पर बात करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है.

हालांकि, बिज़नस की दुनिया में कुछ चीज़ें अब बदल गई हैं, और ये बदलाव अच्छे के लिए नहीं हैं. दरअसल होता ये था कि एक लंबे समय से हर किसी ने मुनाफ़े को बिज़नस और निवेश का केंद्र समझा, और इस मसले पर किसी विमर्श की ज़्यादा ज़रूरत नहीं रही.

ये उन बुनियादी बातों में से रहा जिससे कोई भी बिज़नस करने वाला समझदार व्यक्ति, निवेशक, या एनेलिस्ट इनकार नहीं कर कर सकता था कि अस्तित्व बनाए रखने के लिए मुनाफ़ा मिलता रहना ज़रूरी है. पर कुछ बातें बदल गई हैं. कम-से-कम कैपिटल में ज़्यादा मुनाफ़ा हासिल करना, बढ़ते हुए मुनाफ़े का ज़्यादा फ़ायदेमंद होना जैसी सोच पिछले दस साल में ग़ायब हो गई है. कई लोग, ख़ासतौर पर मीडिया और सोशल मीडिया की अंतहीन गप्पबाज़ी में मुनाफ़े को अब ज़रूरी नहीं समझा जाता. ये सब, स्टार्टअप प्रोपगंडा की सोच के कारण हुआ है. असल स्टार्टअप नहीं, बल्कि वो वाले, जो वेंचर शिकारियों के चलाए हुए होते हैं. अभी हाल तक, भारत में ये बातें सिर्फ़ सोशल मीडिया और मीडिया तक ही सीमित थीं, और शेयर बाज़ार या निवेशकों की असल दुनिया का हिस्सा नहीं हुआ करती थीं. हालांकि, सदा घाटे में चलने वाले 'स्टार्टअप' के IPOs ने इन प्रेतों को भारत के इक्विटी मार्केट तक ला खड़ा किया हैं. हालांकि, जब तक ये विदेशी वेंचर कैपिटल से चल रहे हैं, मुझे इनकी परवाह नहीं. पर अब भारतीय इक्विटी निवेशक घाटे के इन बिज़नस में—जो असल में बिज़नस ही नहीं हैं—जब अपना पैसा लगाने लगे हैं, तब हमें भी इस प्रोपगंडा के ख़िलाफ़ मुखर होने की ज़रूरत है.

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इसी को लेकर, वैल्यू रिसर्च, वेल्थ इनसाइट (Wealth Insight) की ये कवर स्टोरी आपके बड़े काम की है. मुझे नहीं लगता कि ये कोई आम कवर स्टोरी है, बल्कि मैं तो कहूंगा कि ये स्टोरी एक ख़ास मक़सद समेटे हुए है. ये ज़रूरत है मुनाफ़े की अहमियत को लेकर बिगुल बजाने की. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि निवेश की दुनिया में मुनाफ़ा बादशाह है, बल्कि इसलिए कि इस दुनिया का असली और अहम नागरिक भी यही है.

भारत की सबसे मुनाफ़े वाली कंपनियों पर किए जाने वाले सालाना इशू को शुरू हुए सात साल होने जा रहे हैं. इस दौरान, हमारी रिसर्च टीम के कामकाज के तरीक़े भी काफ़ी बदले हैं. शुरुआत में जिस तरह की मुनाफ़े वाली कंपनियों की साधारण रैंकिग हुआ करती थी, अब बदल गई है. अब ये कहीं ज़्यादा व्यापक और कई फ़ैक्टर्स के आधार पर होने वाला अनालेसिस बन गयी है. हमने धीरे-धीरे कंपनियों के अनालेसिस में मुनाफ़े के अलावा कई नए पहलू शामिल किए हैं. अनालेसिस में किए जाने वाले ये बदलाव बड़े ही सोचे-समझे और सिलसिलेवार तरीक़े से किए गए हैं. पिछले कुछ सालों में, भारतीय बिज़नसों ने कई मुश्किलें झेली हैं - कुछ ख़त्म हो गईं पर कुछ फल-फूल रही हैं. मगर इस पूरे अर्से में हमारी टीम ने, इन बदलती हुई परिस्थितियों का बारीक़ी से विश्लेषण किया है जिसका नतीजा ये हुआ है कि 'मुनाफ़ा' शब्द का असल मतलब काफ़ी हद तक बदल दिया है. अब ये कहीं ज़्यादा व्यापक हो गया है. अब ये किसी अकाउंटेंट या टैक्स एक्सपर्ट के मुनाफ़ा शब्द से कहीं आगे निकल गया है और एक निवेशक के लिए कहीं ज़्यादा मायने रखने वाला शब्द बन गया है.

2016 से ही डेटा-आधारित स्टॉक के चुनाव के लिए जब आप हमारा अनालेसिस पढ़ते हैं और हमारी चुनी हुई कंपनियों को देखते हैं, तो कुछ नाम आपको ज़रूर अचरज में डालेंगे. 'अच्छी कंपनियां' क्या हैं इसे लेकर हममें से हर किसी की अपनी पसंद-नापसंद होती है, और जैसे ही हमारी अपनी सोच से अलग कुछ सुझाव सामने आते हैं हम उन्हें नापसंद कर देते हैं. डेटा पर आधारित मज़बूत तर्कों के साथ अपनी बात कहने की हमारी सबसे बड़ी प्रेरणा यही है कि ये तरीक़ा हम सभी को हमारी निजी पसंद-नापसंद का सामना करने और उन पर सवाल उठाने में मदद करेगा.

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