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कम गंवाना > ज़्यादा कमाना

मार्केट में चाहे तेज़ी हो, पर आप मुनाफ़ा बढ़ाने के बजाए नुक़सान कम करने पर ध्यान दें.

मार्केट में चाहे तेज़ी हो, पर आप मुनाफ़ा बढ़ाने के बजाए नुक़सान कम करने पर ध्यान दें.

"गिरते हुए मार्केट, तेज़ी वाले मार्केट से कहीं ज़्यादा नाटकीय होते हैं. अगर 19 साल से हर रोज़ यही काम करके मैंने कुछ सीखा है, तो ये कि ये बात ज़्यादा अहम है कि अच्छे वक़्त में ज़्यादा बनाने के बजाए, बुरे वक़्त में ज़्यादा गंवाने से बचा जाए", ये बात ज़ीरोधा के को-फ़ाउंडर निखिल कामत ने हाल ही में अपनी एक सोशल मीडिया पोस्ट में कही. निवेश करते हुए, अक्सर लोग अच्छे नतीजे पाने पर ही अपना सारा ध्यान लगाए रखते हैं. पर वो ये भूल जाते हैं कि कम समय के दौरान, इक्विटी में ऊंचे रिटर्न के साथ-साथ ज़्यादा उतार-चढ़ाव भी आते हैं. अब आप कह सकते हैं कि क्योंकि इक्विटी ऐतिहासिक तौर पर लंबे समय में ऊंचे रिटर्न देती है, इसलिए छोटे समय के इन उतार-चढ़ावों पर क्यों ध्यान दिया जाए? और हम, उन म्यूचुअल फ़ंड्स को क्यों पसंद करते हैं जिनमें पियर्स (एक जैसे) के मुक़ाबले गिरावट के ख़िलाफ़ ज़्यादा सुरक्षा होती है? चलिए इन सवालों का जवाब कुछ नंबरों के ज़रिए तलाशते हैं. बड़ी गिरावट से वापस अपना स्तर पाने के लिए ज़्यादा मुनाफ़ा चाहिए अगर आपके पर्स में ₹100 हैं और आप उसमें से ₹20 गंवा देते हैं, तो आपको 20 प्रतिशत का घाटा हुआ. पहले जो रक़म आपके पास थी, उस तक पहुंचने के लिए आपको उसके बराबर मुनाफ़ा कमाना होगा. मगर, क्योंकि आपका बेस छोटा है, यानी, ₹80 का है, इसलिए आपको अपने ₹20 का घाटा पूरा करने के लिए 25 प्रतिशत मुनाफ़े [(20/80) * 100] की ज़रूरत होगी. ये समझना आसान है. जैसे-जैसे घाटे का स्तर बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे वापस अपना स्तर पाने या वापस बराबरी पर आने के लिए मुनाफ़े का प्रतिशत और ज़्यादा बड़ा हो जाता है. मिसाल के तौर पर, एक 50 प्रतिशत पोर्टफ़ोलियो का घाटा पूरा करने के लिए आपको 100 प्रतिशत रिटर्न पाना होगा. बड़े घाटे की भरपाई के लिए बड़े मुनाफ़े की ज़रूरत नुक़सान का

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