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क्या बाज़ार सच में इतने जोखिम भरे हैं?

अगर जोखिम का मतलब उतार-चढ़ाव है, तो हां - शेयर बाज़ार काफ़ी जोखिम भरे हैं. लेकिन अगर लंबे समय में नुक़सान की आशंका को जोखिम माना जाए, तो यह जोखिम पूरी तरह क़ाबू में रखा जा सकता है

अगर जोखिम का मतलब उतार-चढ़ाव है, तो हां - शेयर बाज़ार काफ़ी जोखिम भरे हैं. लेकिन अगर लंबे समय में नुक़सान की आशंका को जोखिम माना जाए, तो यह जोखिम पूरी तरह क़ाबू में रखा जा सकता हैAditya Roy/AI-Generated Image

एक अमेरिकी कॉमेडियन की बात है - जब भी कोई उनसे पूछता था, "आपकी पत्नी कैसी हैं?" तो वह जवाब में पूछते थे, "किसकी तुलना में?" एक पुराने और हमेशा चर्चा में रहने वाले सवाल का जवाब भी कुछ इसी तरह है. क्या इक्विटी में निवेश रिटेल निवेशकों के लिए बहुत जोखिम भरा है? किससे तुलना करें? असली सवाल यह नहीं है कि निवेशक रिटेल है या बड़ा - असली सवाल यह है कि निवेश लंबे समय के लिए है या कम समय के लिए, और निवेश चुनते वक़्त वह कितनी समझदारी और सूझबूझ से काम लेता है.

व्यावहारिक तौर पर कहें तो शेयर बाज़ार में जोखिम वक़्त की बात है. जितने लंबे समय के लिए निवेश किया जाए, उतना जोखिम कम होता है. 'रिटेल निवेशकों' के नुक़सान की जो बात होती है, वह आम तौर पर उन लोगों के बारे में होती है जो आमतौर पर बाज़ार में नहीं आते, लेकिन पिछले बुल रन में जल्दी मुनाफ़े की उम्मीद में घुस गए. ऐसे बहुत से निवेशक हैं और यह मुमकिन है कि उन्हें नुक़सान हो. इसके बारे में कुछ नहीं किया जाना चाहिए. ऐसे 'निवेशक' - चाहे रिटेल हों या कोई और - को अपने नुक़सान से हैरान नहीं होना चाहिए.

लेकिन लंबे समय के निवेशक भी हैं जो बाज़ार के उतार-चढ़ाव को देखकर घबरा जाते हैं. यहां मुझे लगता है कि लोगों को यह तय करना होगा कि जोखिम का मतलब क्या है और नुक़सान का मतलब क्या है. हम में से ज़्यादातर लोग तब बेचैन हो जाते हैं जब किसी निवेश की क़ीमत गिरती है. हम ₹1 लाख लगाते हैं, कुछ महीनों में वह ₹2 लाख हो जाता है. फिर जब वह ₹1.6 लाख पर आ जाता है, तो हम जोखिम की दुहाई देने लगते हैं - जैसे ₹40,000 का नुक़सान हो गया हो. यह नुक़सान नहीं है. ऐसा उतार-चढ़ाव उसी सौदे का हिस्सा है जो हमें शुरुआत में ऊंचा रिटर्न देता है.

अगर जोखिम का मतलब उतार-चढ़ाव है (जैसा ज़्यादातर लोग मानते हैं) तो शेयर बाज़ार सच में बहुत जोखिम भरे हैं. लेकिन अगर जोखिम का मतलब लंबे समय में नुक़सान की आशंका है (जैसा मेरे ख़याल से हर निवेशक को मानना चाहिए) तो इस जोखिम को पूरी तरह क़ाबू में रखा जा सकता है और काफ़ी हद तक यह आपके निवेश के फ़ैसलों की क़ाबिलियत पर निर्भर करता है. तो अच्छे फ़ैसले कैसे लें? इसका जवाब आसान है - म्यूचुअल फ़ंड के ज़रिये निवेश करें और इसकी ज़िम्मेदारी किसी ऐसे शख़्स को दें जिसका ट्रैक रिकॉर्ड सार्वजनिक तौर पर अच्छा रहा हो.

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एक पल के लिए सोचिए. जब किसी को कोई गंभीर बीमारी हो, तो क्या उसे डॉक्टर के पास जाना चाहिए? या ख़ुद को 'रिटेल डॉक्टर' घोषित करके अपना इलाज करना चाहिए? सिर्फ़ इसलिए कि आपके पास निवेश के लिए पैसे हैं, यह ज़रूरी नहीं कि आपको निवेश करने की भी तरक़ीब आती हो - जैसे बीमार होने का मतलब यह नहीं कि आप ख़ुद को ठीक कर सकते हैं.

मेरा मानना है कि इक्विटी निवेश एक बेहद ख़ास काम है जिसके लिए वह समझ और सूझबूझ चाहिए जो कम लोगों के पास होती है. मैं यह नहीं कह रहा कि यह काबिलियत सिर्फ़ प्रोफ़ेशनल फ़ंड मैनेजर्स के पास होती है. बहुत से निवेशक भी इसमें माहिर हैं और बहुत से प्रोफ़ेशनल फ़ंड मैनेजर भी औसत से कम रहते हैं. लेकिन जब बाज़ार चढ़ रहा हो, तब ख़ुद को यह यक़ीन दिलाना बेहद आसान और ख़तरनाक होता है कि आप अच्छे निवेश के क़ाबिल हैं.

मीडिया में BSE सेंसेक्स की रोज़ाना की हांफती-दौड़ती कवरेज यह छाप छोड़ती है कि शेयर बाज़ार एक बेहद जोखिम भरा कसीनो है जहां पैसे बनाने के लिए अनजान दांव पर सब-कुछ लगाना पड़ता है. और अगर आप शॉर्ट-टर्म के सट्टेबाज़ हैं, तो शायद यह सच भी हो. लेकिन जिसने सालों तक अच्छे ट्रैक रिकॉर्ड वाले म्यूचुअल फ़ंड्स में लगातार निवेश किया हो, उसके लिए बाज़ार किसी भी दूसरे निवेश से कहीं बेहतर रिटर्न देने का लगभग पक्का ज़रिया है.

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