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किस्मत बनाती है ख़ास!

बुल मार्केट में, अच्छा समय इन्वेस्टिंग स्किल के रूप में आता है

बुल मार्केट में, अच्छा समय इन्वेस्टिंग स्किल के रूप में आता हैAditya Roy/AI-Generated Image

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1929 में, अमेरिकी स्टॉक मार्केट में भारी गिरावट की वजह ये थी कि लोग मार्जिन पर ज़्यादा ख़रीदारी कर रहे थे, यानी उधार लेकर शेयर ख़रीद रहे थे. खुद बेंजामिन ग्राहम भी लीवरेज्ड दांव पर नुक़सान उठा बैठे. उन्होंने बड़ी मुश्किल से सीखा कि सिर्फ़ किस्मत से अमीर बनना निवेश कौशल नहीं होता.

इस हफ़्ते, ग्राहम के सबसे मशहूर छात्र ने कुछ ऐसा लिखा है जो इस सीख को एक नई दिशा में आगे बढ़ाता है.

वॉरेन बफ़े, जो अब 95 साल के हैं और बर्कशायर हैथवे से हट रहे हैं, ने हाल ही में शेयरहोल्डर्स के लिए शायद अपना आख़िरी और लंबा लेटर प्रकाशित किया. इसमें वो ये बात खुलकर स्वीकार करते हैं, जिसे ज़्यादातर सफल लोग कहने से बचते हैं: “सिर्फ़ बदकिस्मती से, जन्म के वक़्त मेरी स्थिति अच्छी नहीं थी.” आगे वो बताते हैं कि किस तरह किस्मत ने हर मोड़ पर उनका साथ दिया, जन्म के समय से लेकर उन लोगों तक जिनसे मुलाक़ात हुई.

बफ़े की इस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया. छह दशक तक दुनिया का सबसे महान निवेशक कहे जाने के बावजूद, वो अपनी सफलता में किस्मत की भूमिका को लेकर बिल्कुल साफ़ हैं. वो दावा नहीं करते कि सिर्फ़ कौशल ने उन्हें यहां पहुंचाया. वो मानते हैं कि 1930 के दशक के अमेरिका में जन्म लेना, कई संभावित मुसीबतों से बच जाना और सही समय पर सही लोगों से मिलना, इन सबने उनकी सफलता में बड़ी भूमिका निभाई.

अब इसकी तुलना हर बुल मार्केट के दौरान होने वाली स्थितियों से कीजिए. अचानक, दो साल पहले शेयर ख़रीदने वाले लोग खुद को वेल्थ बनाने में किसी ख़ास समझ वाले निवेशक की तरह महसूस करने लगते हैं. इसमें कॉमन बात क्या है? उन्होंने अच्छे समय को निवेश कौशल समझ लिया. उन्हें याद नहीं रहता - या कभी पता ही नहीं था - कि बढ़ता बाज़ार सभी नावों को ऊपर उठाता है, चाहे नाव कितनी भी कमजोर क्यों न हो.

किस्मत और कौशल का ये भ्रम असली नुक़सान करता है. जब बाज़ार पलटता है, जैसा कि वो हमेशा करता है, तो ऐसे निवेशक चकित रह जाते हैं. वे समझते थे कि वे बहुत कुशल हैं, पर असल में वे सिर्फ़ किस्मत वाले थे. ग्राहम ने ये सीख 1929 में कठिन तरीक़े से सीखी. अपनी बेहतर समझ के बावजूद, गिरावट ने उन्हें लगभग तोड़ दिया क्योंकि वो उधार लिए पैसे और उधार की उम्मीद पर चल रहे थे.

बफ़े ने ग्राहम की ग़लतियों से सीखा, लेकिन उन्होंने एक और अहम बात भी सीखी - सफलता में किस्मत की भूमिका को पहचानने की क्षमता. यही शायद सबसे अहम सीख है, क्योंकि यही वो विनम्रता पैदा करती है जो बड़े नुक़सानों से बचाती है. अगर कोई मान ले कि सफलता सिर्फ़ कौशल से मिली है, तो वो समय के साथ और जोखिम लेगा. अगर कोई समझ ले कि किस्मत ने भी भूमिका निभाई है, तो वो ज़्यादा सावधान रहेगा.

आज के रिटेल निवेशकों को इस समझ की बेहद ज़रूरत है. मुझे अक्सर ऐसे लोग मिलते हैं जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में निवेश शुरू किया और सच में मानते हैं कि उन्होंने बाज़ार का राज़ समझ लिया है. उन्होंने पैसा कमाया है, कई बार अच्छा पैसा और इसका पूरा श्रेय वे अपने एनालेसिस या साहसिक दांव को देते हैं.

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असल में वे ये कह रहे होते हैं कि उनकी टाइमिंग अच्छी रही. वे उस समय बाज़ार में आए जब लिक्विडिटी और ग्रोथ का दौर असाधारण था. लेकिन क्योंकि उन्होंने कभी असली गिरावट नहीं देखी, वे नहीं जानते कि किस तरह स्थिति तेज़ी से बदल सकती है.

नसीम तालेब इसे “किस्मत से निकले ड्रॉ को निवेश कौशल समझ लेना” कहते हैं. ये जाल अनुभवी निवेशकों को भी फंसा देता है, पर कम अनुभव वाले निवेशकों के लिए ये और खतरनाक है. उन्होंने अभी तक ‘संकेत और शोर’ में, या टिकाऊ बढ़त और आकस्मिक सफलता में फ़र्क़ करना सीखा ही नहीं होता.

लगभग सात दशक की सफलता के बाद भी, बफ़े इस फ़र्क़ को बार-बार ज़ोर देकर बताते हैं. वह अप्रत्याशित घटनाओं (केले के छिलकों, प्राकृतिक आपदाओं, नशे में या लापरवाही से गाड़ी चलाना जैसी चीज़ों) से बच जाने का ज़िक्र करते हैं और कहते हैं कि “किस्मत चंचल है.” वो याद दिलाते हैं कि सबसे कुशल निवेशक को भी किस्मत की ज़रूरत पड़ती है.

इसका व्यावहारिक सबक़ ये नहीं है कि कौशल को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए. बफ़े के पास असाधारण कारोबारी फ़ैसले और एनालेसिस है. असल में, ये समझने के लिए इतनी विनम्रता होनी चाहिए कि नतीजे कौशल और किस्मत दोनों पर निर्भर करते हैं, और हमेशा नहीं पता होता कि किसका प्रभाव ज़्यादा होगा.

रिटेल निवेशकों के लिए, इसका मतलब ऐसी स्ट्रैटेजी बनाना है जो अच्छे और बुरे दोनों समय में टिक पाए. इसका मतलब ये समझना है कि कुछ साल का अच्छा रिटर्न किसी को अजेय नहीं बना देता. इसका मतलब ये समझना है कि बाज़ार साइक्लिकल है और हाल की सफलता, आपकी समझदारी से ज़्यादा टाइमिंग की देन हो सकती है.

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