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एन्युटी से बचने का रास्ता

PFRDA ने चुपचाप एक ऐसी समस्या का समझदारी भरा समाधान खोज लिया है जिसे वो ठीक नहीं कर सका

PFRDA ने चुपचाप एक ऐसी समस्या का समझदारी भरा समाधान खोज लिया है जिसे वो ठीक नहीं कर सकाAditya Roy/AI-Generated Image

पिछले हफ़्ते पेंशन फ़ंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ने नेशनल पेंशन सिस्टम में एक बड़ा बदलाव किया. नॉन-गवर्नमेंट सब्सक्राइबर्स के लिए रिटायरमेंट के समय अनिवार्य एन्युटी ख़रीद को कुल कॉर्पस के 40 प्रतिशत से घटाकर सिर्फ़ 20 प्रतिशत कर दिया गया है. अब कॉर्पस का 80 प्रतिशत तक हिस्सा एकमुश्त निकाला जा सकता है. अगर कॉर्पस ₹8 लाख से कम है, तो एन्युटी ख़रीदने की कोई ज़रूरत ही नहीं है.

फ़ाइनेंशियल प्रेस ने इसे ‘सब्सक्राइबर्स के लिए ज़्यादा फ़्लेक्सिबिलिटी’ के तौर पर कवर किया है, जो असल में है भी. लेकिन इस बदलाव को देखने का एक और दिलचस्प तरीक़ा है. जब कोई रेगुलेटर किसी प्रोडक्ट के लिए अनिवार्य ख़रीद की शर्त को 40 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर देता है, तो वो असल में ये कह रहा होता है कि वो प्रोडक्ट जिस तरह से काम करना चाहिए था, वैसे काम नहीं कर रहा. और भारत में एन्युटी, साफ़ शब्दों में कहें तो, काम नहीं कर रही है.

एन्युटी की बुनियादी इकनॉमिक्स को समझिए. रिटायरमेंट के समय एकमुश्त रक़म इंश्योरेंस कंपनी को दी जाती है और बदले में कंपनी ज़िंदगी भर एक तय मासिक रक़म देने का वादा करती है. भारत में मौजूदा एन्युटी रेट सालाना क़रीब 5-7 प्रतिशत के आसपास हैं. हर ₹1 करोड़ की एन्युटी ख़रीद पर महीने के लगभग ₹50,000 मिल सकते हैं. ये सुनने में ठीक लगता है, जब तक दो बातें साफ़ न हो जाएं. पहली, ये पूरी इनकम टैक्सेबल होती है. दूसरी, और ज़्यादा अहम बात, ये ₹50,000 बीस साल बाद भी ₹50,000 ही रहेंगे, उस समय जब एक कप चाय की क़ीमत आज के पूरे खाने जितनी हो सकती है.

इस बीच, इंश्योरेंस कंपनी आपकी रक़म का क्या करती है? वो इस पैसे को निवेश करती है, ऐसे रिटर्न कमाती है जो महंगाई के साथ चलते हैं या उससे बेहतर होते हैं, और उसी कमाई से आपको एक तय रक़म देती रहती है. कंपनी की इनकम बढ़ती रहती है; आपकी पेमेंट नहीं. 25 साल के रिटायरमेंट में ये असमानता आपकी फ़ाइनेंशियल हालत के लिए काफ़ी नुक़सानदेह हो सकती है. इंश्योरेंस कंपनी के पास महंगाई से सुरक्षा होती है; आपके पास नहीं. असल में, उनकी सुरक्षा की क़ीमत आप चुका रहे होते हैं.

ये एक ऐसी समस्या है जिसे इंश्योरेंस रेगुलेटर को ठीक करना चाहिए था और मैं इंश्योरेंस इकोसिस्टम की कई कमियों पर पहले भी लिख चुका हूं. लेकिन NPS में हुए बदलाव हमें क्या बताते हैं? पेंशन रेगुलेटर, जिसके पास किसी भी आम सेवर्स से ज़्यादा ताक़त और रिटायरमेंट नतीजों पर ज़्यादा फ़ोकस होना चाहिए, अगर वो भी एन्युटी को ठीक करने की उम्मीद छोड़कर ये तय करता है कि बस एन्युटी ख़रीद की अनिवार्यता ही कम कर दी जाए, तो फिर किसी सुधार की उम्मीद करना मुश्किल है. प्रोडक्ट को सुधारने की बजाय शर्त को कम करना ज़्यादा समझदारी भरा विकल्प माना गया.

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फिर भी, जहां तारीफ़ बनती है, वहां ज़रूर होनी चाहिए. PFRDA ने हाथ खड़े नहीं किए हैं. उसने चुपचाप एक बेहतरीन विकल्प तैयार किया है, उन लोगों के लिए जो थोड़ा ध्यान देने को तैयार हैं. इन्हीं बदलावों के तहत अब NPS से एग्ज़िट को 85 साल की उम्र तक टाला जा सकता है. अगर रिटायरमेंट 60 पर हुआ, तो अगले 25 साल तक कॉर्पस निवेश में बना रह सकता है और बढ़ता रह सकता है. एन्युटी की तय पेमेंट के उलट, यहां ग्रोथ कंपाउंड होती है और महंगाई के साथ चलती है.

इतना ही नहीं, अब सिस्टमैटिक यूनिट रिडेम्शन (Systematic Unit Redemption) का विकल्प भी है, जिसके ज़रिए NPS कॉर्पस से समय-समय पर पैसा निकाला जा सकता है, जबकि बाक़ी रक़म निवेश में बनी रहती है. इसे म्यूचुअल फ़ंड के SWP जैसा समझिए, बस यहां पैसा पेंशन कॉर्पस से निकलता है. रक़म काम करती रहती है और ज़रूरत के हिसाब से निकासी होती रहती है.

और इस साल अक्तूबर से, PFRDA के मल्टीपल स्कीम फ़्रेमवर्क (Multiple Scheme Framework) के तहत नॉन-गवर्नमेंट सब्सक्राइबर्स के लिए इक्विटी में निवेश की सीमा 75 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दी गई है. जिन निवेशकों के पास रिटायरमेंट तक अभी कई दशक हैं, उनके लिए ये एक बड़ा रिफ़ॉर्म है. अगर एक्यूम्यूलेशन फेज़ में पूरा इक्विटी एक्सपोज़र और 85 साल तक निवेश में बने रहने का विकल्प जोड़ दिया जाए, तो ये एक ऐसा रिटायरमेंट व्हीकल बनता है जो सच में महंगाई से लड़ सकता है.

लेकिन इसमें एक शर्त है. इसके लिए रिटायरमेंट की ज़िम्मेदारी कुछ हद तक ख़ुद उठानी होगी. एसेट एलोकेशन को समझना होगा, कब और कितना पैसा निकालना है इस पर सोच-समझकर फ़ैसले लेने होंगे, और तय मासिक रक़म की गारंटी की जगह बाज़ार से जुड़ी अनिश्चितता को स्वीकार करना होगा. ये हर किसी के लिए सही नहीं है, और हर किसी को ऐसा करना भी नहीं चाहिए. कई रिटायर्ड लोगों के लिए, एक तय मासिक इनकम, चाहे वो कितनी ही कम क्यों न हो, वो मानसिक सुकून देती है जो कोई भी मार्केट-लिंक्ड प्रोडक्ट नहीं दे सकता.

लेकिन जो लोग अपने रिटायरमेंट से जुड़े फ़ाइनेंसेज में सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार हैं, उनके लिए PFRDA ने एन्युटी ट्रैप से निकलने का रास्ता बना दिया है. पेंशन रेगुलेटर इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स को ठीक नहीं कर सका, तो उसने एक कारगर तरीक़ा तैयार कर दिया. कई बार, रेगुलेटरी समझदारी का सबसे व्यावहारिक रूप यही होता है.

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