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सारांशः Genus Power ने फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में ₹605 करोड़ का मुनाफ़ा कमाया. इसी साल ऑपरेशंस में ₹203 करोड़ की कैश भी बाहर गया और यह लगातार तीसरे साल हुआ. ऑर्डर बुक ₹25,173 करोड़ पर है. मुनाफ़े का आंकड़ा और कैश का आंकड़ा दो अलग-अलग कहानियां सुना रहे हैं.
Genus Power ने फ़ाइनेंशियल ईयर 26 में ₹605 करोड़ का मुनाफ़ा कमाया. उसी साल ऑपरेशंस में ₹203 करोड़ का कैश बाहर गया.
यह कोई एक बार की बात नहीं है. फ़ाइनेंशियल ईयर 25 में ऑपरेशंस से कैश फ़्लो नेगेटिव ₹443 करोड़ था. और उससे पहले भी ऐसा ही रहा. लगातार तीन साल मुनाफ़ा बढ़ता रहा, और लगातार तीन साल कैश आने से ज़्यादा तेज़ी से बाहर जाता रहा. ऑर्डर बुक ₹25,173 करोड़ पर है. रेवेन्यू लगभग दोगुना हो गया. मैनेजमेंट को अगले साल ₹6,000 से ₹6,500 करोड़ की उम्मीद है.
उत्साह समझ में आता है. लेकिन इस बिज़नेस के भीतर कुछ बदल गया है. और वह बदलाव वो है जो मुनाफ़े का आंकड़ा नहीं बताता.
पुराना मॉडल और नया मॉडल
Genus पहले बिजली के मीटर बनाती थी, यूटिलिटीज़ को बेचती थी और पैसे ले लेती थी. सीधा-सादा कारोबार. प्रोडक्ट जाता था, कैश आता था.
भारत में स्मार्ट मीटर के आग़ाज़ ने यह सब बदल दिया. देशभर की बिजली कंपनियों को पुराने मीटर बदलकर स्मार्ट मीटर लगाने हैं जो बिजली चोरी कम करने में मदद करते हैं. लेकिन ज़्यादातर यूटिलिटीज़ के पास पहले से पूरा पैसा देने की क्षमता नहीं है. इसलिए Genus जैसी कंपनियां अब पूरे प्रोजेक्ट को खुद फ़ाइनेंस करती हैं: मीटर ख़रीदना, लगाना, सॉफ़्टवेयर से जोड़ना और सालों तक मेंटेन करना. यूटिलिटी धीरे-धीरे चुकाती है.
Genus आज ख़र्च करती है. वसूली बाद में होती है. कभी-कभी बहुत बाद में.
बस यही एक बदलाव आगे की पूरी कहानी समझा देता है. कंपनी ने प्रोडक्ट बेचने से आगे बढ़कर लंबे प्रोजेक्ट को फ़ाइनेंस और मैनेज करने का काम चुना.
ऑर्डर बुक और उसके पीछे कौन है
Genus की ₹25,173 करोड़ की ज़्यादातर ऑर्डर बुक Gemstar नाम के एक प्लेटफ़ॉर्म में है. Genus की Gemstar में 26 प्रतिशत हिस्सेदारी है. बाक़ी हिस्सा सिंगापुर के सॉवरेन वेल्थ फ़ंड GIC की बैकिंग वाले एक फ़ंड के पास है.
Gemstar के पास बिजली कंपनियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट्स हैं. वह असल काम के लिए Genus को नियुक्त करती है, जिसमें मीटर सप्लाई करना, लगाना और मेंटेन करना शामिल है. Genus इस काम के बदले रेवेन्यू बुक करती है. इसलिए पूरी ऑर्डर बुक Genus के रेवेन्यू से जुड़ी है, न कि सिर्फ़ एक चौथाई.
GIC की बैकिंग की वजह से Genus को बड़े प्रोजेक्ट मिलते हैं जिन्हें वह अकेले फ़ंड नहीं कर सकती थी. लेकिन इसका मतलब यह भी है कि Genus एक लंबी पेमेंट चेन के बीच काम कर रही है: अभी मैटेरियल्स और लेबर पर ख़र्च करो, माइलस्टोन अप्रूवल्स और सर्विस चार्जेस का बाद में इंतज़ार करो.
सालाना रेवेन्यू का लगभग आधा अभी बाक़ी
फ़ाइनेंशियल ईयर 26 के अंत तक Genus के काम का एक बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका था लेकिन उसके पैसे अभी नहीं मिले थे.
पूरे हो चुके और बिल किए जा चुके काम के बदले ग्राहकों की तरफ़ से बाकी रक़म ₹1,484 करोड़ थी, जो सालाना रेवेन्यू का लगभग एक तिहाई है. काम पूरा लेकिन अभी औपचारिक बिल नहीं हुआ, इसमें ₹867 करोड़ और जुड़ते हैं. इन्वेंट्री यानी ख़रीदा गया लेकिन अभी इस्तेमाल न हुआ मैटेरियल ₹1,351 करोड़ था. पहले दोनों मिलाकर फ़ाइनेंशियल ईयर 26 के रेवेन्यू का लगभग आधा बनते हैं, जो बैलेंस शीट पर कैश बनने का इंतज़ार कर रहे हैं.
अच्छी ख़बर यह है कि चीज़ें सही दिशा में जा रही हैं. पेमेंट वसूलने में लगने वाला औसत वक़्त एक साल में 187 दिन से घटकर 89 दिन हो गया. बिज़नेस में कैश फंसे रहने का कुल वक़्त 343 से घटकर 274 दिन हो गया. मैनेजमेंट को अगले साल इसमें 50 से 75 दिन की और कमी की उम्मीद है.
लेकिन तेज़ी से बढ़ने की क़ीमत उधारी के आंकड़े में दिखती है. कुल डेट यानी कैश घटाने के बाद कंपनी पर जो क़र्ज़ बचता है, वो एक साल में ₹605 करोड़ से लगभग तिगुना होकर ₹1,573 करोड़ हो गया. मैनेजमेंट को उम्मीद है कि कैश साइकिल सुधरने से पहले यह ₹2,000 करोड़ के आसपास पीक पर रहेगा.
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दो बातें जिन पर नज़र रखें
फ़ाइनेंशियल्स से परे दो मुद्दे हैं जिन पर नज़र रखनी चाहिए.
कंपनी के ऑडिटर्स ने बताया कि संबंधित एंटिटीज, यानी वो कंपनियां जहां Genus के सीनियर मैनेजमेंट का ख़ासा प्रभाव है, उनसे जुड़े लोन देर से चुकाए गए या उनकी अवधि बढ़ा दी गई. रक़म इतनी बड़ी नहीं है कि बिज़नेस को ख़तरे में डाले. लेकिन एक ऐसी कंपनी के लिए जिसे ख़ुद बढ़ने के लिए वर्किंग कैपिटल चाहिए, यह एक असहज करने वाला संकेत ज़रूर है.
अलग से, एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट 2022-23 के बिहार के दो स्मार्ट-मीटर कॉन्ट्रैक्ट्स की जांच कर रही है. आरोप है कि Genus ने बिहार की बिजली कंपनियों से ₹997 करोड़ और ₹2,850 करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट्स अनियमित तरीक़े से हासिल किए. अभी ये सिर्फ़ आरोप हैं, कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकला है. लेकिन चूंकि ये कॉन्ट्रैक्ट्स स्मार्ट मीटर बिज़नेस के एक ख़ासे हिस्से से जुड़े हैं, इसलिए इस पर नज़र रखना ज़रूरी है.
इस कहानी के दो अंत
अगर प्रोजेक्ट इंस्टालेशन से लाइव मीटर्स तक, फिर स्वीकृत बिलिंग से कैश कलेक्शन तक आसानी से बढ़ते रहे, तो मौजूदा दबाव कम होगा. पिछले साल का मुनाफ़ा असली था. ग्राहक मौजूद हैं. स्मार्ट-मीटर पर अमल बड़े पैमाने पर हो रहा है. जैसे-जैसे प्रोजेक्ट स्थिर होंगे, हर कॉन्ट्रैक्ट का मेंटेनेंस का काम सालों तक एक स्थिर आमदनी देता रहेगा.
अगर प्राप्तियां (receivables) ऊंचे बने रहे और बिलिंग मंजूरियां सुस्ती के साथ आती रहें, तो Genus मज़बूत मुनाफ़ा दिखाती रहेगी और साथ में ग्रोथ फ़ंड करने के लिए हर साल और क़र्ज़ भी लेती रहेगी. P&L अच्छा दिखेगा. बैलेंस शीट पर दबाव बढ़ता जाएगा.
Genus की परेशानी इसलिए नहीं है कि ग्राहक स्मार्ट मीटर नहीं चाहते. यह उस बिज़नेस की ढांचागत ख़ासियत से जूझ रही है जो उसने चुना है: कैश पहले जाता है और धीरे-धीरे वापस आता है. ऑर्डर बुक बड़ी है. कैश उसके पीछे आता है या नहीं, अभी बस यही एक सवाल मायने रखता है.
कैश सच में मुनाफ़े के पीछे आ रहा है या नहीं, यह हर तिमाही नतीजे में, प्राप्तियों का हर अपडेट में, हर माइलस्टोन अप्रूवल्स में ट्रैक करते रहना, ज़्यादातर निवेशकों के पास इस तरह की लगातार निगरानी के लिए वक़्त नहीं होता. Value Research Stock Advisor यही काम करता है. कम स्टॉक्स, सही तरह से स्टडी किए गए और buy, hold और sell का साफ़ नज़रिया.
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