Abhijeet Pandey/AI Generated Image
सारांशः दो फ़ंड भले ही एक ही कैटेगरी के हों, उनके मुनाफ़े पर टैक्स अलग-अलग लग सकता है. इसकी वजह ये है कि SEBI की कैटेगरी और इनकम टैक्स की कैटेगरी, दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं. टैक्स इस बात से तय होता है कि फ़ंड ने अपना पैसा किन चीज़ों में और कितना लगाया है. इस लेख में हम आसान भाषा में समझेंगे कि टैक्स के लिहाज़ से फ़ंड कितनी तरह के होते हैं, कोई फ़ंड किस कैटेगरी में आता है, और यूनिट बेचने से पहले आपको क्या-क्या देख लेना चाहिए.
आपने दो मल्टी-एसेट फ़ंड में पैसा लगाया. दोनों ही शेयर, डेट और गोल्ड में निवेश करते हैं. दोनों एक ही SEBI कैटेगरी में आते हैं. डेढ़ साल बाद आप दोनों से पैसा निकाल लेते हैं.
और यहीं हैरानी होती है. एक फ़ंड के मुनाफ़े को लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन माना जाता है, जिस पर टैक्स कम लगता है. दूसरे के मुनाफ़े को शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन माना जाता है, जिस पर आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से ज़्यादा टैक्स कटता है. कैटेगरी एक ही होने के बावजूद दोनों का टैक्स अलग निकलता है.
दरअसल, किसी फ़ंड की कैटेगरी और उसकी टैक्स कैटेगरी, ये दो अलग बातें हैं. SEBI की कैटेगरी सिर्फ़ इतना बताती है कि फ़ंड किस तरह निवेश करेगा. इनकम टैक्स इस नाम को नहीं देखता. वो अपने अलग तरीक़े से जांचता है कि फ़ंड का पैसा असल में किन चीज़ों में लगा है और कितना लगा है. यही बात तय करती है कि आपका मुनाफ़ा कितने समय बाद लॉन्ग-टर्म कहलाएगा और उस पर टैक्स कितना लगेगा.
टैक्स की नज़र में फ़ंड 3 तरह के होते हैं
इनकम टैक्स का नियम हर म्यूचुअल फ़ंड को इन तीन में से किसी एक ख़ाने में रखता है.
टैक्स कैटेगरी
|
|
कब लॉन्ग-टर्म माना जाएगा | लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन पर टैक्स | शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन पर टैक्स |
|---|---|---|---|
| इक्विटी-ओरिएंटेड फ़ंड (कम से कम 65% पैसा भारतीय लिस्टेड शेयरों में) | 12 महीने से ज़्यादा रखने पर | 12.5%, साल में ₹1.25 लाख की छूट के बाद | 20% |
| स्पेसिफ़ाइड (डेट) फ़ंड, 1 अप्रैल 2023 को या उसके बाद ख़रीदी यूनिट्स (65% से ज़्यादा पैसा डेट और मनी-मार्केट में) | कभी नहीं. इसे लॉन्ग-टर्म का दर्जा मिलता ही नहीं | लागू नहीं | पूरा मुनाफ़ा आपके स्लैब के हिसाब से |
| बाक़ी सभी फ़ंड (गोल्ड, सिल्वर, इंटरनेशनल और कुछ हाइब्रिड फ़ंड) | लिस्टेड यूनिट्स 12 महीने से ज़्यादा, अनलिस्टेड यूनिट्स 24 महीने से ज़्यादा रखने पर | 12.50% | आपके स्लैब के हिसाब से |
ये दरें भारत में रहने वाले आम निवेशक के लिए हैं. इनके ऊपर 4% हेल्थ और एजुकेशन सेस अलग से लगता है, और आमदनी ज़्यादा हो तो सरचार्ज भी. एक बात और ध्यान रखिए. अब किसी भी फ़ंड के लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन पर इंडेक्सेशन का फ़ायदा नहीं मिलता, यानी महंगाई के हिसाब से ख़रीद क़ीमत बढ़ाकर टैक्स घटाने की जो सुविधा पहले थी, वो अब नहीं रही.
एक ग़लतफ़हमी यहीं दूर कर लीजिए. ₹1.25 लाख की छूट हर फ़ंड पर अलग-अलग नहीं मिलती. आपके सारे शेयरों और इक्विटी फ़ंड्स के लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन को जोड़कर, पूरे साल में ये एक ही छूट मिलती है. और सोने या इंटरनेशनल फ़ंड के मुनाफ़े पर तो ये छूट है ही नहीं.
किन फ़ंड्स को इक्विटी वाला टैक्स मिलता है?
टेबल में सबसे ऊपर वाली, यानी इक्विटी-ओरिएंटेड कैटेगरी का लॉन्ग-टर्म टैक्स सबसे कम लगता है. वजह ये कि इसमें सिर्फ़ 12 महीने रखने पर ही मुनाफ़ा लॉन्ग-टर्म हो जाता है और लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन पर साल में ₹1.25 लाख तक की छूट भी मिल जाती है. तो सवाल ये है कि कोई फ़ंड इस कैटेगरी में आता कब है?
शर्त बस एक है. फ़ंड का कम से कम 65% पैसा भारतीय कंपनियों के लिस्टेड शेयरों में लगा होना चाहिए. और यहीं एक बारीकी है, जिस पर लोग अक्सर चूक जाते हैं. इस 65% में सिर्फ़ भारतीय लिस्टेड शेयर गिने जाते हैं. विदेशी शेयर, सोना, चांदी और REITs या InvITs की यूनिट्स इस गिनती से बाहर रहती हैं.
इसे एक उदाहरण से समझिए. मान लीजिए किसी फ़ंड के पोर्टफ़ोलियो में 70% हिस्सा 'शेयरों' में दिख रहा है, लेकिन उसमें से 15% विदेशी कंपनियों के शेयर हैं. ऐसे में टैक्स की गिनती में सिर्फ़ 55% ही भारतीय लिस्टेड शेयर माने जाएंगे. यानी फ़ंड 65% की शर्त से चूक गया और उसे इक्विटी वाला टैक्स नहीं मिलेगा, भले ही उसके नाम में 'इक्विटी' लिखा हो.
एक बात और. ये 65% किसी एक दिन के पोर्टफ़ोलियो से नहीं आंका जाता, बल्कि पूरे साल के औसत से. इसलिए अगर किसी एक महीने शेयरों का हिस्सा 65% से नीचे चला भी जाए, तो घबराने की ज़रूरत नहीं. इतने भर से फ़ंड की टैक्स कैटेगरी नहीं बदल जाती.
डेट फ़ंड में क्या अलग होता है?
जिस फ़ंड का 65% से ज़्यादा पैसा डेट और मनी-मार्केट में लगा हो, उसे 'स्पेसिफ़ाइड फ़ंड' कहते हैं. ऐसे फ़ंड की जो यूनिट्स आपने 1 अप्रैल 2023 को या उसके बाद ख़रीदी हैं, उन पर मुनाफ़ा हमेशा शॉर्ट-टर्म ही माना जाएगा. आप उन्हें तीन साल रखें या पांच साल, टैक्स आपके स्लैब के हिसाब से ही लगेगा.
लेकिन यहां ख़रीद की तारीख़ बहुत मायने रखती है. इसी फ़ंड की जो यूनिट्स आपने 1 अप्रैल 2023 से पहले ख़रीदी थीं, उन पर ये ख़ास नियम लागू नहीं होता. जैसे, किसी सामान्य डेट फ़ंड की, अप्रैल 2023 से पहले ख़रीदी गई अनलिस्टेड यूनिट्स अगर आप सितंबर 2026 में बेचते हैं, तो 24 महीने से ज़्यादा हो जाने की वजह से वो लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन कहलाएगा और उस पर 12.5% टैक्स लगेगा, बिना इंडेक्सेशन के. इसीलिए बेचने से पहले अपनी यूनिट्स की ख़रीद तारीख़ ज़रूर देख लीजिए.
एक ही कैटेगरी में फ़र्क़ कहां-कहां आता है?
अब ज़रा शुरुआत वाले उदाहरण पर लौटते हैं. मान लीजिए, पहले मल्टी-एसेट फ़ंड ने साल भर औसतन 70% पैसा भारतीय लिस्टेड शेयरों में रखा, जबकि दूसरे ने सिर्फ़ 40% शेयरों में, 40% डेट में और 20% गोल्ड में. पहला फ़ंड इक्विटी वाली 65% की शर्त पूरी कर देता है, इसलिए डेढ़ साल बाद बेचने पर उसका लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन हो जाता है. दूसरा फ़ंड न तो इक्विटी की शर्त पूरी करता है और न ही 65% डेट वाली, इसलिए वो 'बाक़ी फ़ंड' में गिना जाता है, जहां लॉन्ग-टर्म के लिए 24 महीने चाहिए. यही वजह है कि उसका शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन रह जाता है. (ये सिर्फ़ समझाने के लिए दिया गया उदाहरण है.)
ऐसे ही कुछ और मौक़े हैं, जहां फ़ंड का नाम देखकर धोखा हो सकता है.
- बैलेंस्ड एडवांटेज और इक्विटी सेविंग्स फ़ंड में शेयर बाज़ार का जोखिम भले कम दिखे, फिर भी इन्हें अक्सर इक्विटी वाला टैक्स मिल जाता है. होता ये है कि इनमें आर्बिट्राज़ के लिए शेयर ख़रीदकर उतने ही फ़्यूचर्स बेच दिए जाते हैं. इससे आपका जोखिम तो घट जाता है, पर फ़ंड के पास पड़े वो भारतीय लिस्टेड शेयर 65% की गिनती में जुड़ जाते हैं.
- फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड में थोड़े-बहुत विदेशी शेयर होने भर से टैक्स नहीं बदल जाता. असल में देखना ये है कि भारतीय लिस्टेड शेयरों की 65% की सीमा पूरी हो रही है या नहीं.
- गोल्ड और सिल्वर के मामले में फ़ंड का स्ट्रक्चरल फ़र्क़ डाल देता है. इनके लिस्टेड ETF की यूनिट्स को 12 महीने से ज़्यादा रखने पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन हो जाता है, जबकि उन्हीं ETF में पैसा लगाने वाले अनलिस्टेड FoF के लिए 24 महीने का इंतज़ार करना पड़ता है.
- फ़ंड ऑफ़ फ़ंड्स (FoF) का टैक्स इस बात पर निर्भर करता है कि वो आख़िर में पैसा किसमें लगाता है, न कि उसके नाम पर. सिर्फ़ नाम में 'इक्विटी FoF' होना काफ़ी नहीं है.
फ़ंड का पोर्टफ़ोलियो समय के साथ बदल जाए तो?
एक बात जो आपको राहत देगी. फ़ंड मैनेजर के पोर्टफ़ोलियो बदलने भर से आप पर कोई टैक्स नहीं आ जाता, और न ही आपकी यूनिट्स की ख़रीद तारीख़ बदलती है. टैक्स का सवाल तो तभी उठता है जब आप ख़ुद अपनी यूनिट्स बेचते या रिडीम करते हैं.
पर एक पेच ज़रूर है. मान लीजिए किसी साल फ़ंड की टैक्स कैटेगरी बदल गई. नियम कहीं ये नहीं कहता कि ऐसी हालत में मुनाफ़े का कुछ हिस्सा इक्विटी और कुछ नॉन-इक्विटी मानकर अलग-अलग टैक्स लगेगा. आम समझ यही है कि आप जिस साल यूनिट्स बेचते हैं, उसी साल की टैक्स कैटेगरी पूरे मुनाफ़े पर लागू होगी. और वो कैटेगरी उस पूरे साल के औसत से तय होती है.
इसका सीधा असर ये है. जो फ़ंड आपके ख़रीदते समय इक्विटी-ओरिएंटेड था, अगर बेचने वाले साल में वो 'बाक़ी फ़ंड' की कैटेगरी में चला जाए, तो डेढ़ साल बाद बेचने पर भी उसका शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन में गिना जा सकता है. और इसका उल्टा भी हो सकता है. लाइफ़-साइकिल फ़ंड इसकी अच्छी मिसाल हैं, जिनमें लक्ष्य की तारीख़ जैसे-जैसे पास आती है, शेयरों का हिस्सा घटता जाता है और टैक्स कैटेगरी बदल सकती है.
पुराने चिल्ड्रेंस और रिटायरमेंट फ़ंड के निवेशकों को यहां थोड़ा और सतर्क रहना चाहिए. SEBI ने 2026 में सॉल्यूशन-ओरिएंटेड कैटेगरी को समेटने और ऐसी स्कीमों को मिलते-जुलते फ़ंड्स में मिलाने की प्रक्रिया शुरू की है. ऐसे में अपनी AMC की ताज़ा सूचना ज़रूर देख लें.
तो यूनिट बेचने से पहले क्या देखें?
- फ़ंड का टैक्स स्टेटस देखिए. स्कीम के दस्तावेज़ (SID और KIM) और हर महीने की फ़ैक्टशीट में एक लाइन होती है, जो बताती है कि स्कीम टैक्स के लिहाज़ से इक्विटी-ओरिएंटेड मानी जाती है या नहीं. ये फ़ंड की अपनी घोषणा होती है और साल-दर-साल बदल भी सकती है.
- सिर्फ़ अपडेटेड पोर्टफ़ोलियो नहीं, पूरे साल का हाल देखिए. चूंकि गिनती पूरे साल के औसत से होती है, इसलिए पिछले महीनों की रिपोर्ट भी देख लें. किसी एक महीने का आंकड़ा पूरी तस्वीर नहीं बताता.
- अपनी ख़रीद तारीख़ देखिए. आपने यूनिट्स कब ख़रीदीं, इसी से होल्डिंग पीरियड और डेट फ़ंड वाला 1 अप्रैल 2023 का नियम, दोनों तय होते हैं. SIP में तो हर किस्त की तारीख़ अलग होती है, इसलिए हर किस्त की गिनती भी अलग होगी.
- शक हो तो AMC से पूछ लीजिए. अगर फ़ंड की कैटेगरी बीच में बदली हो, या दस्तावेज़ में बात साफ़ न हो, तो सीधे AMC से पक्का कर लें कि आपके बेचने वाले साल में स्कीम किस टैक्स कैटेगरी में मानी जाएगी.
वैल्यू रिसर्च की राय
फ़ंड चुनते वक़्त सबसे पहला सवाल तो हमेशा यही रहेगा कि आपका लक्ष्य क्या है, आप कितना रिस्क उठा सकते हैं, और उस फ़ंड की आपके पोर्टफ़ोलियो में क्या जगह है. टैक्स इसके बाद की बात है. पर जब पैसा निकालने की बारी आए, तब इसे नज़रअंदाज़ मत कीजिए, क्योंकि ऊपर से एक जैसे दिखने वाले दो फ़ंड भी टैक्स के बाद अलग नतीजा दे सकते हैं. कैटेगरी का नाम एक जैसा होने का ये मतलब नहीं कि आख़िर में हाथ आने वाली रक़म भी एक जैसी होगी.
यह भी पढ़ें: फ़ंड स्विच करने से कंपाउंडिंग का फ़ायदा ख़त्म हो जाता है?
ये लेख पहली बार सितंबर 18, 2026 को पब्लिश हुआ.




