
एक बात बार-बार कही जाती है। अगर कस्टमर संतुष्ट है तो यह इस बात का संकेत है कि यह अच्छा संकेत है। यह बात लगभग खुद को साबित करती है। और ऐसा लगता है कि यह बात काफी हद तक सच है। हालांकि जैसा विज्ञान में होता है उसी तरह से अगर हम इक्विटी में निवेश की बात करें तो ‘सच होना चाहिए का’ कोई मतलब नहीं है। क्या यह कुछ ऐसी चीज है जिसे मापा जा सकता है। क्या कस्टमर की संतुष्टि और शेयर होल्डर्स के लिए ऊंचे रिटर्न को आपस में जोड़ कर दिखाया जाना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि जब में इस बात की जांच करना शुरू करता हूं तो इसके खिलाफ उदाहरण अपने आप आप आने शुरू हो जाते हैं। कई ऐसे बिजनेस हैं जिनके साथ मैं शेयर होल्डर के तौर पर व्यक्तिगत रूप से काफी खुश हूं लेकिन एक कस्टमर के तौर पर ऐसा नहीं है। भारत का सबसे अधिक मुनाफा कमाने वाला प्राइवेट सेक्टर बैंक पहला नाम है जिसे मैं इस सूची में रखना चाहूंगा लेकिन निश्चित तौर पर यह अकेला नहीं है।
ज्यादातर लोग जो इस मुद्दे पर सोचते हैं उनका मानना है कि अगर कस्टमर की संतुष्टि निवेश के रिटर्न के बारे में संकेतक के तौर पर काम करती है तो ऐसा इसलिए होगा क्योंकि यह भविष्य के मुनाफे के बारे में एक अग्रणी संकेतक है। जो निवेशक नहीं हैं वे भी इस बात को समझेंगे कि निवेशक के रिटर्न को बढ़ाने वाली सबसे अहम चीज कंपनी के वित्तीय नतीते हैं। इसके साथ दूसरी सूचनाएं जैसे इंडस्ट्री और बिजनेस आउटलुक, मैनेजमेंट की गुणवत्ता, नियामकीय माहौल और मौजूदा स्टॉक कीमतें आदि।
अगर आप इसके बारे में सोचते हैं तो इन सारे डेटा और सूचनाओं का अपने आप में कोई मतलब नहीं है। यह सभी सूचनाएं बीते समय के बारे में हैं। वहीं एक निवेशक के तौर पर आपकी दिलचस्पी भविष्य को लेकर होगी। जो रकम आप बनाएंगे वह इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनी भविष्य में क्या करेगी और इसकी स्टॉक कीमतों का क्या होगा। आप भविष्य नहीं जान सकते तो आप बीते समय की सूचनाओं का इस्तेमाल भविष्य की परछाईं के तौर पर करते हैं। अगर कोई कंपनी बीते सालों में अपना मुनाफा बढ़ा रही है तो इस बात की काफी अधिक संभावना है कि वह भविष्य में भी ऐसा करेगी। अगर मैंनेजमेंट ने बीते समय में कंपनी को अच्छी तरह से चलाया है तो इस बात की संभावना काफी अधिक है कि वह भविष्य में भी ऐसा करता रहेगा। हालांकि इक्विटी रिसर्च के बारे में हम शायद ही इस तरह से सोचते हैं। यह एक तरह से भविष्य के बारे में भविष्यवाणी करने का तरीका है।
कस्टमर की संतुष्टि से भविष्य के बारे में संकेत मिलना चाहिए। हालांकि मैं एक बार फिर चाहिए शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं। जब मैं कस्टमर बनाम शेयर होल्डर के वास्तविक अनुभव पर गौर करता हूं तो मुझे यह अपने आप में बहुत सुखद अहसास नहीं देता है। ऐसे कस्टमर होना अच्छा है जो संतुष्ट हैं और ऐसे कस्टमर होना और भी अच्छा है जो बाहर न निकल सके। कंपनियां ऐसे कस्टमर पसंद करती हैं जो बाहर न जा सकें भले ही वे कितने ही असंतुष्ट हों। आप बहुत आसानी से अपना बैंक नहीं बदल सकते। आप बहुत आसानी से दूसरी इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के पास नहीं जा सकते। आपको इस बात पर गौर करना चाहिए कि यह सभी लाइसेंस बिजनेस हैं, जहां सरकार गेट कीपर के तौर पर काम करती है। टेलीकॉम कंपनियां भी इसी कैटैगरी में आती हैं लेकिन नंबर पोर्टेबिलिटी ने गेम बदल दिया।
जब मैं यह कॉलम लिख रहा हूं तो फेसबुक और इसकी दूसरी सेवाएं दुनिया भर में घंटों तक शटडाउन से रिकवर हो रही हैं। तो क्या आप फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्स एप के विकल्पों पर स्विच करने जा रहे हैं। जो लोग इन सेवाओं का लंबे समय से इस्तेमाल कर रहे हैं उनके लिए ऐसा सोचना भी मुश्किल है। फेसबुक जैसी कंपनी के पास कस्टमर नहीं हैं। इसके पास बंधक हैं। यह बात कम से कम उन लोगों के लिए सच है जो सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं लेकिन वास्तविक कस्टमर्स के लिए यह बात सच नहीं है जो एडवरटाजर्स हैं।
यह सब बातें एक असहज निष्कर्ष निकालती हैं कि ऐसे कस्टमर वाली कंपनियां जो उसके बंधक हैं निवेशकों के लिए संतुष्ट कस्टमर वाली कंपनियों की तुलना में बेहतर हैं। आखिकार मुनाफे वाला बिजनेस वही है जो यह सुनिश्चित कर सके कि कस्टमर लगातार भुगतान करता रहे और बिजनेस को उन पर कम से कम खर्च करना पड़े। कस्टमर का खुश रहना ऐसा करने का एक तरीका है लेकिन कस्टमर आपसे बंधा रहे यह दूसरा तरीका है। जैसा कि टेलीकॉम कंपनियों और नंबर पोर्टेबिलिटी का उदाहरण दिखाता है नियामकीय संस्थाओं को इस बात को पहचानना होगा और इसके आस-पास ही रास्ता निकालना होगा। बैंक अकाउंट पोर्टेबिलिटी? क्या यह एक विचार है जिसका समय आना चाहिए ?



