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क्या मायने रखता है और क्या नहीं

वो क्या फ़ैक्टर हैं जो आने वाले बरसों में देश के इक्विटी निवेशकों के निवेश को ताक़त देंगे?

वो क्या फ़ैक्टर हैं जो आने वाले बरसों में देश के इक्विटी निवेशकों के निवेश को ताक़त देंगे?


अक्सर मैंने ख़बरों के आधार पर निवेश करने की सोच के ख़िलाफ़ लिखा है। जैसे ही आप इस बात को सुनते हैं कि न्यूज़पेपर या टीवी न्यूज़ (या किसी और माध्यम) की हर घटना पर निवेशकों को रिएक्ट नहीं करना है, तो एक और स्वाभाविक सवाल खड़ा हो जाता है कि किस ख़बर पर रिएक्ट करना चाहिए। आख़िर ये तो कोई भी नहीं कह सकता कि स्टॉक में निवेश, जानकारी के अभाव में होने चाहिए। कि उनके फ़ैसले एक ऐसे वैक्यूम में किए जाते हैं जहां निवेश पर बाहरी दुनिया का कोई असर ही नहीं होता। तो, यहां यही जानने की कोशिश करते हैं कि वो कैसी ख़बरें हों, जिन पर निवेशकों को ध्यान देना चाहिए।
इसके लिए, सबसे पहले ये समझने की ज़रूरत है कि ऐसे कौन से बड़े फ़ैक्टर हैं जो अगले कुछ बरसों में भारतीय इक्विटी निवेशक की क़िस्मत का फैसला करेंगे? इसमें पहली चीज़ जो दिमाग़ में आती है (नहीं, वो कोविड नहीं है), वो है, सैक्टर्स और कंपनियों में कॉर्पोरेट प्रॉफ़िट का बढ़ना। और कॉर्पोरेट कर्ज़ का पिछले कई साल के मुक़ाबले कम होना। ये फ़ैक्टर्स आने वाले दिनों में स्टॉक के दामों पर सीधा असर करने वाले हैं। मगर इस तरह की जानकारी शायद ही कभी प्रोफ़ेशनल या सोशल न्यूज़ में किसी गर्मागर्म ख़बर का हिस्सा बने।
इसके अलावा और किस तरह की जानकारी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है? पश्चिम में मंहगाई की चिंताओं के बावजूद, वैश्विक ब्याज की दरें कम हैं और विदेशी कैपिटल का लगातार भारत में आना जारी है। स्टार्टअप एक्टीविटी भी बढ़ी हुई हैं और इनका असर भी काफ़ी अच्छा हो रहा है। हालांकि मॉडर्न डिजिटल स्टार्टअप को लेकर मुझे शक़ है। मगर इन कंपनियों में विदेशी फ़ंड्स का निवेश खुशी की बात है। चिंता है तो सिर्फ़ इस बात की कि कहीं घरेलू निवेशक भी विदेशी कंपनियों के नक्शेक़दम पर न चल पड़ें, पर ये दूसरी ही कहानी है।
इसके अलावा भी कई सवाल हैं जिनपर सोचना चाहिए। क्या आपने नोटिस किया है कि अब रेग्युलेटरी कमियों पर कोई हेडलाईन नज़र नहीं आतीं? कोयले की खानों, पावर प्लांट के समझौतों, बैंकों के नॉन-परफ़ॉर्मिंग एसेट्स, और टैक्स के मसलों पर बड़े-बड़े कोर्ट केस, अब इनकी ख़बरें नहीं दिखाई देती। पहले इन सेक्टरों में जो मसले छाए रहते थे, वो कहीं ग़ायब हो गए हैं। अब जो दिखाई देता है वो है-इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर ज़ोर, प्रोडक्शन लिंक्ड स्कीमें, गुड्स एंड सर्विसिज़ और दूसरे टैक्स में स्थिरता, और साथ ही मैन्युफ़ैक्चरिंग का बढ़ना-ये असली ख़बरें हैं। मगर ये बातें बिज़नस न्यूज़ के दायरे में फ़िट नहीं बैठतीं। ये तो सही है कि ये ख़बरें अच्छी हैं, मगर फिर बुरी ख़बरों का क्या? तो कोविड के अलावा, अगर बुरी ख़बरें होंगी, तो ऊपर गिनाए फ़ैक्टर्स की ठीक उलटी ख़बरें होंगी।
कुछ भी हो, क़रीब-क़रीब यही वो बातें हैं जो अगले कुछ साल या ज़्यादा-से-ज़्यादा कुछ महीनों में, धीरे-धीरे परिवर्तन लाएंगी। पर इन बातों में ‘ख़बर’ जैसा कुछ नहीं है। और सीरियस निवेशक को ऐसी ही ख़बरों पर ग़ौर करना चाहिए, जो धीरे-धीरे बदलाव लाने वाली पर गहरे महत्व की हों। अगर आप समंदर के किनारे दस मिनट खड़े हो जाएं, तो आपको धीरे से बढ़ने वाले ज्वार का असर नहीं दिखाई नहीं देगा। आप ज्वार या भाटे के समय समंदर के किनारे को ही उसका स्वाभाविक स्तर समझ बैठेंगे। पर आईडिया ये भी नहीं है कि आप ख़बरों को पढ़ें ही नहीं। पर हां, आपको हर ख़बर की प्रकृति की सही पहचान करनी होगी। इस समझ के साथ कि टुकड़ों में मिलने वाली हर जानकारी, आपके फ़ैसलों पर क्या असर डालती है।
अब वापस उन्हीं असल फ़ैक्टर्स की बात करते हैं जिनका ज़िक्र मैंने ऊपर किया है। मैंने ख़बर या जानकारी की अहमियत की बात सिर्फ़ अपनी राय देने के लिए नहीं कही है। क्योंकि कोविड और कुछ दूसरे मसलों के बावजूद, आज भारत की अर्थव्यवस्था और बिज़नस के क्षेत्र में हवा का रुख़ सही है। और इक्विटी मार्केट, आने वाले समय के सही आकलन पर ही टिका होता है।
निवेशकों के लिए समझदारी इसी में है कि वो चमक-दमक और हाईप को नज़रअंदाज़ करें-जैसे, डिजिटल IPOs. वो ये देखें कि भारतीय अर्थव्यवस्था बुनियादी तौर पर किधर जा रही है। उन्हें अपना निवेश ऐसे बिज़नस में लगातार करते रहना चाहिए जो स्थिर हैं और फ़ायदे में चल रहे हैं। सच तो ये है, IPOs को नज़रअंदाज़ करना निवेश की नीति के लिए न सिर्फ़ प्रासंगिक है, बल्कि उसके केंद्र में भी है, और यही बात हाल की कई घटनाओं से भी ज़ाहिर होती है। निवेश का ये तरीक़ा सरल है, और समय की कसौटी पर खरा उतरने वाला ये तरीक़ा काम करता है। हर बार।

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