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'पेशेवर' सलाह से सावधान रहें

ब्रोकर्स और एडवाइज़र्स की बात आंखें मूंद कर मानना आपकी वेल्थ को चुपचाप तबाह कर सकता है. अच्छा निवेश किसी सलाह पर भरोसे से नहीं, बल्कि उस पर सवाल उठाने से शुरू होता है.

ब्रोकर्स और एडवाइज़र्स की बात आंखें मूंद कर मानना आपकी वेल्थ को चुपचाप तबाह कर सकता है. अच्छा निवेश किसी सलाह पर भरोसे से नहीं, बल्कि उस पर सवाल उठाने से शुरू होता है.Aditya Roy/AI-Generated Image

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कई साल पहले मेरी मुलाक़ात एक ऐसे शख़्स से हुई जो ख़ुद को शेयर बाज़ार का पुराना खिलाड़ी समझते थे. लेकिन वो हैरान थे कि उनके सभी शेयर ख़रीद मूल्य के आधे से भी नीचे क्यों आ गए. वो जानना चाहते थे कि ऐसा क्यों हुआ. आमतौर पर मैं ऐसी बातचीत से बच निकलता हूं, लेकिन यह एक रिश्तेदार की शादी थी और वो भी उसी में शामिल थे, इसलिए सामाजिक मजबूरी में मैंने पूछ लिया कि उन्होंने किन कंपनियों में पैसे लगाए हैं. उन्होंने एक दर्जन से ज़्यादा नाम गिना दिए और मैं चौंक गया. एक भी नाम जाना-पहचाना नहीं था. किसी भी इन्वेस्टमेंट एनालिस्ट या बिज़नेस मीडिया से जुड़े शख़्स की तरह मेरी भी सैकड़ों कंपनियों के बारे में थोड़ी-बहुत समझ है, या कम से कम उनके नाम तो सुने ही हैं. फिर भी उनकी लिस्ट में एक भी नाम ऐसा नहीं था जो मैंने कभी सुना हो.

ऊपरी तौर पर मुझे हैरान नहीं होना चाहिए था क्योंकि इस देश में हज़ारों लिस्टेड कंपनियां हैं. लेकिन सच यह है कि उनमें से ज़्यादातर निवेश के नज़रिए से बिल्कुल बेकार हैं और कोई उन्हें गंभीरता से नहीं लेता. मेरा तो हमेशा यही मानना था कि कुछ निवेशक एक-दो ऐसी कंपनियों में फंस जाते हैं, लेकिन कोई ऐसा पोर्टफ़ोलियो बनाए जिसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ ऐसी ही कंपनियां हों - यह तो मेरे लिए नामुमकिन लगता था. लेकिन यहां साफ़ है कि ग़लती उनके दोस्त की नहीं थी. यह पोर्टफ़ोलियो उनकी अपनी रिसर्च का नतीजा नहीं था. हर एक शेयर एक ब्रोकर ने रेकमेंड किया था, साथ में यह कहानी भी कि यह एक शानदार निवेश है.

लेकिन इस शादी में मेरी मुसीबत अभी ख़त्म नहीं हुई थी. इसके बाद मेरी मुलाक़ात एक ऐसे सज्जन से हुई जो म्यूचुअल फ़ंड्स के साथ कुछ ऐसा ही कर रहे थे. इन महाशय के पास मैंने जो म्यूचुअल फ़ंड्स का जमावड़ा देखा, वैसा बेतरतीब कलेक्शन मैंने पहले कभी नहीं देखा था. उसमें हर उस इक्विटी फ़ंड का नाम था जिसका शायद किसी ने कभी ज़िक्र किया हो - और सबकी हिस्सेदारी नाममात्र की थी. क्या यह पोर्टफ़ोलियो उनकी अपनी सोच से बना था? बिल्कुल नहीं. यह पूरी तरह एक 'प्रोफ़ेशनल' एडवाइज़र की राय पर टिका था, जिनकी सलाह हमेशा यही रहती थी कि जो फ़ंड बेचा जा सके वो बेचो और जो नया आया हो वो ख़रीदो.

जो बात मुझे सबसे ज़्यादा खली वो यह थी कि दोनों मामलों में निवेशक अपने निवेश के बारे में सही सवाल पूछ रहे थे. दोनों में यह समझने की क़ाबिलियत थी कि कहां कुछ ग़लत है और इसे ठीक करने की चाहत भी. लेकिन दोनों को उन्हीं लोगों ने जानबूझकर गुमराह किया गया था, जो पैसे लेकर निवेश की सलाह देते हैं. मुझे नहीं पता इसका कोई रिश्ता है या नहीं, लेकिन यह सब दिल्ली या मुंबई में नहीं, जमशेदपुर में हुआ था. जमशेदपुर कोई पिछड़ी जगह नहीं है - शहर में चलते हुए सभी बड़े बैंकों, 'न्यू-एज' ब्रोकर्स और म्यूचुअल फ़ंड्स के बोर्ड दिखते हैं. शायद इसका कोई नाता हो, कौन जाने? शायद मुंबई और दिल्ली के निवेशकों के पास दूसरी राय लेने के ज़्यादा रास्ते थे. या शायद नहीं भी थे.


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