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माइक्रो-कैप फ़ंड में कितना दम?

आइए, माइक्रो-कैप स्टॉक की अल्ट्रा-हाई रिस्क और रिवॉर्ड वाली दुनिया पर एक नज़र डालते हैं और जानते हैं इसमें आपके लिए क्या है?

आइए, माइक्रो-कैप स्टॉक की अल्ट्रा-हाई रिस्क और रिवॉर्ड वाली दुनिया पर एक नज़र डालते हैं और जानते हैं इसमें आपके लिए क्या है?

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इन दिनों मोतीलाल ओसवाल फ़ंड हाउस की नई पेशकश निफ्टी माइक्रोकैप 250 इंडेक्स फ़ंड ख़ासी सुर्खियों में है. स्मॉल-कैप और मिड-कैप के रोमांच में मज़े लेने वाले इन्वेस्टर्स को ये फ़ंड काफ़ी पसंद आ सकता है.

भले ही ये नया फ़ंड सब्सक्रिप्शन के लिए अब बंद हो गया है, जिसकी लास्ट डेट 29 जून, 2023 थी. लेकिन इसके लॉन्च के साथ अब माइक्रो-कैप फ़ंड, उससे जुड़े जोख़िम और इनमें छिपे कमाई के मौक़ों पर चर्चा शुरू हो गई है. यहां हम माइक्रो-कैप फ़ंड से जुड़े कई पहलुओं पर ग़ौर कर रहे हैं.

निफ़्टी माइक्रो-कैप 250 इंडेक्स और स्टॉक एलिजबिलिटी क्राइटेरिया?
निफ़्टी माइक्रोकैप 250 इंडेक्स में NSE 500 कंपनियों से इतर 250 बड़ी कंपनियां शामिल हैं. मुख्य रूप से, ये कंपनियां अपने मार्केट कैपिटलाइज़ेशन के आधार पर देश की 501वीं से 750वीं सबसे बड़ी कंपनियां हैं.

इस इंडेक्स में शामिल होने के लिए, स्टॉक्स को कुछ मानक पूरे करने होंगे:

स्टॉक नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (National Stock Exchange) में लिस्ट और ट्रेड होने चाहिए. टॉप 1,000 कंपनियों/स्टॉक्स को पिछले छह महीनों में उनके एवरेज डेली टर्नओवर और डेली फुल मार्केट कॅपिटलिज़ेशन के बेस पर रैंक किया गया हो. ये रैंकिंग सबसे एक्टिव तरीक़े से ट्रेड होने और ज़्यादा वैल्यू वाले स्टॉक्स को तय करने में मदद करती है.

पिछले छह महीनों के दौरान स्टॉक्स की एवरेज इम्पैक्ट कॉस्ट 1 फ़ीसदी से कम होनी चाहिए. इम्पैक्ट कॉस्ट (Impact cost), मार्केट लिक्विडिटी को मापने का एक तरीक़ा है और बताता है कि क़ीमत में बड़े बदलाव के बिना किसी स्टॉक को खरीदना या बेचना कितना आसान है.

निफ़्टी 250 माइक्रो-कैप इंडेक्स के टॉप 5 स्टॉक्स

स्टॉक्स वेट (%)
रेलीगेयर इंटरप्राइजेस लि. 1.53
कर्नाटका बैंक लि. 1.4
उज्जीवन फ़ाइनेंशियल सर्विसेज लि. 1.3
प्रॉक्टर एंड गैम्बल हैल्थ लि. 1.23
रिलायंस पावर लि. 1.07
सोर्स: NSE

इंडेक्स में प्रतिनिधित्व रखने वाले टॉप 5 सेक्टर

स्टॉक्स वेट (%)
कैपिटल गुड्स 19.52
फ़ाइनेंशियल सर्विसेज 13.08
हेल्थकेयर 9.9
केमिकल्स 7.57
कंस्ट्रक्शन 6.66

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इंडेक्स को साल में दो बार मार्च और सितंबर में रिबैलेंस किया जाता है.

वैसे मज़ेदार बात ये है कि माइक्रो-कैप सेगमेंट का सेबी (SEBI) में कोई ऑफ़िशियल सेबी कैटगराइज़ेशन नहीं है.

दरअसल, सेबी के अनुसार, पहले 100 स्टॉक (मार्केट-कैप के हिसाब से) लार्ज-कैप हैं, 101 और 250 के बीच के स्टॉक मिड-कैप हैं, और 250 से ऊपर के स्टॉक स्मॉल-कैप हैं. माइक्रो-कैप की कोई आधिकारिक परिभाषा नहीं है.

माइक्रो-कैप में निवेश कितना जोख़िम भरा?
कई कारणों से माइक्रो-कैप में निवेश करना जोख़िम भरा हो सकता है.

माइक्रोकैप 250 इंडेक्स में छोटी कंपनियां शामिल हैं और आम तौर पर, कंपनी जितनी छोटी होती है, वो उतनी ही जोख़िम भरी होती है.

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लेकिन ये बात दिवंगत राकेश झुनझुनवाला (Rakesh Jhunjhunwala) और आर. के. दमानी (R K Damani) जैसे जाने-माने निवेशकों को माइक्रो-कैप पर दांव लगाने से नहीं रोक सकी. उदाहरण के लिए, झुनझुनवाला ने टाइटन (Titan) में तब निवेश किया था जब 2001-02 में ये लगभग ₹250-300 करोड़ के मार्केट कैपिटलाइजेशन के साथ एक माइक्रो-कैप स्टॉक था. और बाकी सब बातें इतिहास में शामिल हो चुकी हैं.

लेकिन क्या सब कुछ बढ़िया चलता रहा था? ज़रूरी नहीं है. टाइटन में भी उतार-चढ़ाव आए. शुरुआती उथल-पुथल के बावजूद, झुनझुनवाला अपने फ़ैसले पर क़ायम रहे, क्योंकि उन्हें कंपनी के फंडामेंटल्स पर भरोसा था. इससे माइक्रो-कैप स्पेस में सक्रिय निवेश की ताक़त का पता चलता है.

इसके अलावा, इन दोनों निवेशकों के पास माइक्रो-कैप कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी थी, जिससे उन्हें आगे अपनी संपत्ति बढ़ाने में मदद मिली.

दूसरी तरफ, मोतीलाल ओसवाल निफ़्टी माइक्रोकैप 250 इंडेक्स है. ये एक पैसिव फ़ंड (passive fund) है और केवल 250 कंपनियों वाला माइक्रो-कैप इंडेक्स है. दूसरे शब्दों में, फ़ंड के पोर्टफ़ोलियो में 250 स्टॉक होंगे. इसका मतलब है कि इस दुनिया के झुनझुनवाला और दमानियों के उलट, हर कंपनी में काफ़ी छोटा शेयर होगा. इसलिए, भले ही कोई कंपनी मल्टीबैगर बन जाए, आपका कुल मुनाफ़ा उतना अच्छा नहीं हो सकता है.

इससे भी बुरी बात यह है कि केवल कुछ माइक्रो-कैप स्टॉक ही आख़िरकार मिड-कैप या लार्ज-कैप के स्टेटस तक पहुंच पाएंगे. असल में, माइक्रो-कैप स्टॉक्स का एक अहम हिस्सा 'बेकार' साबित हो सकता है, जबकि कुछ मार्केट से बाहर भी हो सकते हैं.

लिक्विडिटी छोटी कंपनियों से जुड़ा एक और मुद्दा है. बाज़ार में ख़रीदने और बेचने वाले कम हो सकते हैं, ख़ासकर तब जब बाज़ार में गिरावट का रुझान हो. अगर आप इस फ़ंड से बाहर निकलने का प्रयास करते हैं तो आप पर इसका असर पड़ सकता है.

मोतीलाल ओसवाल एएमसी (Motilal Oswal AMC) के रिसर्च हेड (पैसिव फ़ंड्स) महावीर कासवा ने कहा, "बाज़ार में मौजूदा हालात को देखते हुए हमें इस सेगमेंट में लिक्विडिटी को लेकर काफी भरोसा है. हर तरह के मार्केट कैपिटलाइजेशन वाले स्टॉक्स में भागीदारी बढ़ी है. हम इस फ़ंड में AUM और नियमित फ़्लो पर नज़र बनाए रखेंगे. आने वाले समय में, अगर एक तय सीमा पार हुई, तो हम एकमुश्त फ़्लो पर रोक लगा सकते हैं लेकिन SIP को जारी रखेंगे."

हमारा क्या है कहना
माइक्रो-कैप फ़ंड के रूप में जोशीले लोगों के लिए एक अन्य विकल्प मिल सकता है, हालांकि, बाकी लोग इंतजार कर सकते हैं.

इससे पहले, DSP ने 2007 में एक माइक्रो-कैप फ़ंड लॉन्च किया था, जिसने सफलता हासिल की और बाद में सेबी (SEBI) के रि-कैटेगराइज़ेशन के बाद इसे स्मॉल-कैप फ़ंड में अपग्रेड कर दिया गया.

इससे पता चलता है कि माइक्रो-कैप फ़ंड में दमखम है.

हालांकि, 250 माइक्रो-कैप स्टॉक्स में निवेश करने वाला एक पैसिव फ़ंड एक ऐसी स्ट्रैटेजी है जिसे अभी भी आज़माए जाने की ज़रूरत है. हम कोई भी राय देने से पहले ये देखना चाहेंगे कि ये अलग-अलग मार्केट साइकल के दौरान कैसी प्रतिक्रिया देता है.

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